हमीरपुर के लोदीपुर निवादा गांव में रक्षाबंधन के दूसरे दिन महिलाओं का अनोखा दंगल आयोजित किया जाता है. खास बात यह है कि इस आयोजन में पहलवानों से लेकर रेफरी और दर्शकों तक सभी महिलाएं होती हैं.
Knews Desk: उत्तर प्रदेश के हमीरपुर जिले का लोदीपुर निवादा गांव अपनी एक अनोखी परंपरा के लिए जाना जाता है. यहां रक्षाबंधन के दूसरे दिन महिलाओं का दंगल आयोजित किया जाता है. इस अखाड़े में गांव की बहुएं, सासें और बुजुर्ग महिलाएं साड़ी और घूंघट में उतरकर कुश्ती लड़ती हैं और अपने दांव-पेंच दिखाती हैं.
इस आयोजन की सबसे खास बात यह है कि दंगल में पुरुषों की एंट्री पूरी तरह प्रतिबंधित रहती है. अखाड़े में कुश्ती लड़ने वाली महिलाओं से लेकर रेफरी, ढोल बजाने वाली और दर्शकों तक सभी महिलाएं ही होती हैं. इस दौरान महिलाएं पूरे जोश के साथ एक-दूसरे को चुनौती देती हैं और कुश्ती में अपनी ताकत का प्रदर्शन करती हैं.
20 से ज्यादा कुश्तियां कराई गईं
हर साल होने वाले इस महिला दंगल में इस बार भी बड़ी संख्या में महिलाओं ने हिस्सा लिया. आयोजकों के मुताबिक, 20 से अधिक कुश्तियां कराई गईं. अलग-अलग मुकाबलों में जीतने वाली महिला पहलवानों को सम्मानित भी किया गया.
पूरे आयोजन की जिम्मेदारी भी महिलाओं के हाथ में रहती है. अखाड़े की व्यवस्था, रेफरी की भूमिका, ढोल बजाने और दर्शकों के प्रबंधन से लेकर दूसरी जिम्मेदारियां महिलाएं ही संभालती हैं.
करीब 500 साल पुरानी बताई जाती है परंपरा
ग्रामीणों के मुताबिक, महिलाओं के इस दंगल की परंपरा करीब 500 साल पुरानी है. स्थानीय मान्यता है कि इसकी शुरुआत अंग्रेजी हुकूमत के समय हुई थी.
बताया जाता है कि उस दौर में गांव के पुरुष कई बार अंग्रेजी शासन के अत्याचारों से बचने के लिए गांव से बाहर चले जाते थे. ऐसी परिस्थितियों में महिलाओं ने अपनी और परिवार की सुरक्षा के लिए आत्मरक्षा के तरीके सीखने शुरू किए. इसी दौरान उन्होंने कुश्ती और दांव-पेंच का अभ्यास भी किया.
समय के साथ महिलाओं का यह अभ्यास एक आयोजन में बदल गया और फिर यह परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती रही.
आज भी कायम है महिलाओं की कुश्ती की परंपरा
आज भी लोदीपुर निवादा की महिलाएं इस परंपरा को उसी उत्साह के साथ निभाती हैं. रक्षाबंधन के दूसरे दिन लगने वाला यह महिला दंगल अब गांव की सांस्कृतिक पहचान बन चुका है.
घूंघट और साड़ी में अखाड़े में उतरती सास-बहुओं और बुजुर्ग महिलाओं का दमखम देखने के लिए बड़ी संख्या में महिलाएं जुटती हैं. यह अनोखा आयोजन न सिर्फ पुरानी परंपरा को जीवित रखे हुए है, बल्कि महिलाओं की ताकत और आत्मविश्वास की मिसाल भी पेश करता है.