हाई कोर्ट मुकदमों पर ऐसे नहीं लगा सकते रोक, सुप्रीम कोर्ट ने दी सख्त हिदायत

सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट्स में ट्रायल की कार्यवाही पर नियमित रूप से रोक लगाने की प्रवृत्ति पर नाराजगी जताई है. कोर्ट ने कहा कि अंतरिम आदेशों को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई के दौरान ट्रायल पर रोक लगाना सामान्य प्रक्रिया नहीं होनी चाहिए.

Knews Desk- सुप्रीम कोर्ट ने देश के सभी हाई कोर्ट को मुकदमों की सुनवाई पर रोक लगाने को लेकर महत्वपूर्ण निर्देश दिया है. कोर्ट ने कहा कि अंतरिम आदेश के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान ट्रायल की कार्यवाही पर रोक केवल असाधारण परिस्थितियों में ही लगाई जानी चाहिए. ऐसी स्थिति तभी बनती है जब ट्रायल जारी रहने से रिविजन की कार्यवाही पर गंभीर और अपूरणीय असर पड़ने की आशंका हो या किसी पक्ष को ऐसा नुकसान हो जिसकी भरपाई संभव न हो.

सुप्रीम कोर्ट ने सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 115 के तहत रिविजन के अधिकार के इस्तेमाल को लेकर भी हाई कोर्ट को आगाह किया. कोर्ट ने स्पष्ट किया कि रिविजन अधिकार का इस्तेमाल अपील की तरह नहीं किया जा सकता.

बॉम्बे हाई कोर्ट का फैसला किया खारिज

यह टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच के एक फैसले को रद्द करते हुए की. हाई कोर्ट ने CPC की धारा 115 के तहत दायर रिविजन याचिकाओं को स्वीकार करते हुए CPC के ऑर्डर VII नियम 11 के तहत एक वाद-पत्र को खारिज कर दिया था.

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ ने कहा कि हाई कोर्ट ने अपने रिविजन अधिकार क्षेत्र की सीमाओं को पार किया और मामले में ट्रायल कोर्ट की तरह तथ्यों की जांच करने की कोशिश की.

क्या था पूरा मामला?

मामला एक सिविल मुकदमे से जुड़ा था. अपीलकर्ता ने प्रतिवादियों के खिलाफ मुकदमा दायर कर 2015 और 2017 में हुए दो सेल डीड को अमान्य घोषित करने की मांग की थी. इसके अलावा विवादित संपत्ति पर प्रतिवादियों के कब्जे को गैरकानूनी घोषित करने और नुकसान व मुआवजे की मांग भी की गई थी.

मुकदमा दाखिल होने के बाद प्रतिवादियों ने CPC के ऑर्डर VII नियम 11 के तहत आवेदन दाखिल किया. उन्होंने दावा किया कि वाद में कार्रवाई का कोई वैध आधार नहीं है और मामला CPC की धारा 11 और 47 के तहत प्रतिबंधित है.

ट्रायल कोर्ट ने खारिज कर दी थी अर्जी

ट्रायल कोर्ट ने प्रतिवादियों की अर्जी को खारिज कर दिया था. कोर्ट ने कहा था कि इस चरण पर प्रतिवादियों की ओर से पेश किए गए दस्तावेजों की विस्तृत जांच नहीं की जा सकती. इस स्तर पर मुख्य रूप से वाद-पत्र और उसके साथ लगाए गए दस्तावेजों को ही देखा जाना चाहिए.

ट्रायल कोर्ट ने यह भी कहा था कि पहले से तय मामले और समय-सीमा से जुड़े सवालों पर मुकदमे की सुनवाई के दौरान फैसला किया जा सकता है.

इसके बाद मामला हाई कोर्ट पहुंचा, जहां रिविजन याचिका के जरिए ट्रायल कोर्ट के आदेश को चुनौती दी गई. हाई कोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए वाद-पत्र को खारिज कर दिया. इसके खिलाफ मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां शीर्ष अदालत ने हाई कोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया और रिविजन अधिकार क्षेत्र के इस्तेमाल की सीमाएं स्पष्ट कीं.

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