Chirag Paswan vs Jitan Ram Manjhi: बिहार में अनुसूचित जाति (SC) आरक्षण के भीतर उप-श्रेणी और क्रीमी लेयर को लेकर केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान और जीतन राम मांझी के बीच मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं. विवाद इतना बढ़ गया है कि दोनों नेता एक-दूसरे से इस्तीफे की मांग तक कर रहे हैं. इसके पीछे आरक्षण की बहस के साथ-साथ बिहार का जातीय समीकरण भी बड़ी भूमिका निभा रहा है.
Knews Desk- मोदी सरकार में मंत्री चिराग पासवान और जीतन राम मांझी इन दिनों आरक्षण के मुद्दे पर आमने-सामने हैं. दोनों नेताओं के विचार SC आरक्षण में उप-श्रेणी और क्रीमी लेयर को लेकर अलग-अलग हैं. जीतन राम मांझी जहां अनुसूचित जाति-जनजाति आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था की समीक्षा की वकालत कर रहे हैं, वहीं चिराग पासवान इसका विरोध कर रहे हैं.
चिराग का कहना है कि SC समुदाय के भीतर अलग-अलग श्रेणियां बनाने से दलित समाज में विभाजन बढ़ सकता है. वहीं मांझी का तर्क है कि अनुसूचित जाति की कुछ जातियां आज भी बेहद पिछड़ी हुई हैं और उन्हें आरक्षण का पर्याप्त लाभ नहीं मिल पा रहा है. ऐसे में सबसे ज्यादा वंचित समुदायों तक आरक्षण का लाभ पहुंचाने के लिए व्यवस्था में बदलाव जरूरी है.
आरक्षण को लेकर दोनों नेताओं की सोच अलग क्यों?
SC आरक्षण में उप-कोटा लागू करने की बहस के बीच चिराग पासवान का मानना है कि दलित समाज को अलग-अलग हिस्सों में बांटना सही नहीं होगा. उन्होंने क्रीमी लेयर की अवधारणा पर भी सवाल उठाए हैं और इस तरह के प्रस्ताव का समर्थन करने वालों के रुख पर आपत्ति जताई है.
दूसरी तरफ जीतन राम मांझी का कहना है कि आरक्षण का फायदा सभी दलित समुदायों को समान रूप से नहीं मिला है. उनका जोर उन जातियों को ज्यादा अवसर देने पर है, जो सामाजिक और आर्थिक रूप से सबसे ज्यादा पिछड़ी हैं.
मांझी के इस रुख का आधार बिहार में सामने आए जातिगत सर्वे और सरकारी नौकरियों से जुड़े आंकड़े भी हैं.
किस दलित समुदाय की कितनी हिस्सेदारी?
बिहार में जातिगत सर्वे से जुड़े आंकड़ों के मुताबिक राज्य में करीब 2.91 लाख अनुसूचित जाति के लोगों के पास सरकारी नौकरी है. इनमें दुसाध समुदाय के करीब 99,230 और राम समुदाय के लगभग 82,290 लोग सरकारी नौकरी में बताए गए हैं.
इसके मुकाबले मुसहर समुदाय के सरकारी कर्मचारियों की संख्या करीब 10,615 बताई गई है. डोम समुदाय के करीब 3,274 लोग सरकारी नौकरी में हैं.
इन आंकड़ों से साफ है कि अलग-अलग SC जातियों के बीच सरकारी नौकरियों में प्रतिनिधित्व काफी असमान है. यही अंतर मांझी के तर्क को मजबूती देता है कि आरक्षण का लाभ सबसे पिछड़े दलित समुदायों तक भी प्रभावी तरीके से पहुंचना चाहिए.
बिहार के प्रमुख SC समुदायों के आंकड़े
| SC समुदाय | सरकारी नौकरी में लोग | कुल आबादी में हिस्सा |
|---|---|---|
| दुसाध | 99,230 | 5.31% |
| राम | 82,290 | 5.25% |
| धोबी | 34,372 | 1.15% |
| पासी | 25,754 | 0.98% |
| मुसहर | 10,615 | 3.08% |
| डोम | 3,274 | 0.20% |
बिहार के जातिगत सर्वे के अनुसार राज्य की कुल आबादी में अनुसूचित जाति की हिस्सेदारी करीब 19.65 फीसदी है. इनमें राम/मोची/रविदास समुदाय की आबादी करीब 5.25 फीसदी, दुसाध समुदाय की करीब 5.31 फीसदी और मुसहर समुदाय की करीब 3.08 फीसदी बताई गई है.
नौकरी के आंकड़ों में कौन सबसे आगे?
सरकारी नौकरी में संख्या के आधार पर देखें तो दुसाध समुदाय सबसे आगे है. इसके बाद राम, धोबी और पासी समुदाय का स्थान आता है. मुसहर और डोम समुदाय की संख्या इनकी तुलना में काफी कम है.
वहीं आबादी के अनुपात में सरकारी नौकरी का आंकड़ा देखें तो दिए गए आंकड़ों के मुताबिक धोबी समुदाय करीब 3.14 फीसदी के साथ सबसे ऊपर है. इसके बाद पासी करीब 2 फीसदी, दुसाध 1.44 फीसदी, डोम 1.24 फीसदी, राम 1.20 फीसदी और मुसहर करीब 0.26 फीसदी पर हैं.
चिराग और मांझी के राजनीतिक हित भी अलग
आरक्षण को लेकर दोनों नेताओं के बीच मतभेद सिर्फ नीतिगत नहीं, बल्कि उनकी राजनीति से भी जुड़े हुए हैं. चिराग पासवान का मजबूत राजनीतिक आधार दुसाध/पासवान समुदाय में माना जाता है. उनके पिता रामविलास पासवान भी लंबे समय तक दलित राजनीति के बड़े चेहरे रहे.
दूसरी ओर जीतन राम मांझी मुसहर समुदाय से आते हैं और बिहार की राजनीति में इस समुदाय की आवाज को प्रमुखता से उठाते रहे हैं. ऐसे में आरक्षण का लाभ किसे और किस तरह मिले, इस मुद्दे पर दोनों नेताओं की प्राथमिकताएं अलग होना स्वाभाविक माना जा रहा है.
आरक्षण की बहस में आमने-सामने दो अलग नजरिए
चिराग पासवान का कहना है कि SC आरक्षण का आधार ऐतिहासिक सामाजिक भेदभाव और छुआछूत जैसी असमानताएं हैं. उनके मुताबिक केवल आर्थिक स्थिति के आधार पर दलित समाज के भीतर अलग वर्ग बनाना उचित नहीं होगा.
वहीं मांझी का मानना है कि यदि आरक्षण का वास्तविक लाभ सबसे कमजोर और पिछड़े समुदायों तक नहीं पहुंच रहा है तो व्यवस्था की समीक्षा जरूरी है. उनके मुताबिक कुछ समुदायों को लगातार ज्यादा लाभ मिलने और कुछ के पीछे रह जाने की स्थिति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.
यही वजह है कि मोदी सरकार के दो मंत्री आरक्षण के एक ही मुद्दे पर बिल्कुल अलग-अलग रुख अपनाए हुए हैं. एक तरफ चिराग पासवान दलित समाज की एकजुटता और मौजूदा आरक्षण व्यवस्था को लेकर चिंतित हैं, तो दूसरी ओर मांझी सबसे वंचित SC समुदायों को ज्यादा प्रतिनिधित्व दिलाने की मांग कर रहे हैं. बिहार का जातीय समीकरण इस पूरे विवाद को और ज्यादा महत्वपूर्ण बना देता है.