सुप्रीम कोर्ट का जज बनकर बेल के लिए दबाव डालना पड़ा महंगा, सुकेश चंद्रशेखर को 8 साल की सजा

KNEWS DESK- दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट ने सुकेश चंद्रशेखर को एक मामले में 8 साल की जेल की सजा सुनाई है. मामला अप्रैल 2017 का है, जब सुकेश ने कथित तौर पर सुप्रीम कोर्ट के जज बनकर एक न्यायिक अधिकारी को फोन किया और पुलिस कस्टडी में मौजूद होने के बावजूद अपने लिए जमानत या अंतरिम जमानत दिलाने का दबाव बनाया था.

चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट हर्षिता मिश्रा ने सुकेश को IPC की धारा 170, 189 और 507 के तहत दोषी ठहराया. 29 अगस्त को कोर्ट ने धारा 170 और 189 के तहत 2-2 साल और धारा 507 के तहत 4 साल की सजा सुनाई. कोर्ट ने निर्देश दिया कि ये सजाएं एक साथ नहीं, बल्कि लगातार चलेंगी, जिससे कुल सजा 8 साल हो गई.

कैसे किया था सुप्रीम कोर्ट के जज का नाटक?

अभियोजन पक्ष के मुताबिक, अप्रैल 2017 में सुकेश एक भ्रष्टाचार के मामले में पुलिस कस्टडी में था. इसी दौरान उसने कथित तौर पर कांस्टेबल मंजीत के मोबाइल फोन का इस्तेमाल कर स्पेशल जज पूनम चौधरी के आधिकारिक लैंडलाइन और निजी मोबाइल नंबर पर कॉल किया. पहली कॉल में खुद को सुप्रीम कोर्ट के एक जज का निजी सचिव बताया गया. इसके बाद दूसरे व्यक्ति ने फोन पर खुद को सुप्रीम कोर्ट का जज बताया और दावा किया कि वह केंद्रीय गृह मंत्रालय और सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की ओर से बात कर रहा है.

कॉल करने वाले ने न्यायिक अधिकारी से सुकेश को तत्काल जमानत या अंतरिम जमानत देने के लिए कहा. साथ ही कथित तौर पर बात नहीं मानने पर गंभीर पेशेवर परिणाम भुगतने की धमकी भी दी गई.

जज ने सुप्रीम कोर्ट से किया संपर्क

न्यायिक अधिकारी को कॉल पर संदेह हुआ तो उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से संपर्क किया. वहां संबंधित जज के वास्तविक निजी सचिव से बात करने पर पता चला कि ऐसा कोई फोन नहीं किया गया था. जिस व्यक्ति को सचिव बताया गया था, वह सुप्रीम कोर्ट में काम भी नहीं करता था. इसके बाद मामले की जांच आगे बढ़ी और कॉल डिटेल रिकॉर्ड समेत अन्य सबूतों के आधार पर सुकेश की भूमिका सामने आई.

कोर्ट ने बताया ‘खतरनाक संस्थागत दखल’

20 अगस्त को दोषी ठहराते हुए कोर्ट ने कहा था कि सुकेश ने न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने के लिए सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जज का रूप धारण किया. अदालत के मुताबिक, यह महज किसी अधिकारी को प्रभावित करने की कोशिश नहीं थी, बल्कि न्यायिक संस्थान के कामकाज में सीधे हस्तक्षेप का प्रयास था. कोर्ट ने यह भी कहा कि न्यायिक आदेश अदालत में पारित होते हैं, उन्हें गुप्त टेलीफोन कॉल के जरिए निर्देशित नहीं किया जा सकता.

दिल्ली पुलिस की जांच पर भी सवाल

मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने दिल्ली पुलिस की जांच को लेकर भी कड़ी टिप्पणी की. अदालत ने कहा कि जांच में कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया. कोर्ट के मुताबिक, जांचकर्ता मोबाइल फोन बरामद करने, क्राइम ब्रांच परिसर की CCTV फुटेज हासिल करने और जरूरी कॉल रिकॉर्ड जुटाने में नाकाम रहे. इसके अलावा यह भी पर्याप्त रूप से जांच नहीं की गई कि पुलिस कस्टडी में रहते हुए सुकेश के पास सुरक्षित स्मार्टफोन तक पहुंच कैसे हुई. इस मामले में कोर्ट का फैसला न्यायिक प्रक्रिया और संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता में हस्तक्षेप को लेकर सख्त संदेश के तौर पर देखा जा रहा है.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *