‘शुद्धिकरण’ के मुद्दे ने उत्तराखंड की राजनीति में दलित सियासत को फिर गर्म कर दिया है. बीजेपी और कांग्रेस दोनों दल दलित हितों की पैरवी कर रहे हैं, लेकिन राज्य गठन के 26 साल बाद भी कोई दलित नेता मुख्यमंत्री की कुर्सी तक नहीं पहुंच सका है.
Knews Desk- उत्तराखंड में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं और चुनावी सरगर्मी के साथ जातीय समीकरण भी चर्चा में आ गए हैं. इस समय राज्य की राजनीति में दलित समाज से जुड़ा मुद्दा खासा गरम है. हल्द्वानी के रामलीला मैदान में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की सभा के बाद कथित ‘शुद्धिकरण’ को लेकर बीजेपी और कांग्रेस आमने-सामने हैं. राहुल गांधी की टिप्पणी के बाद उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज होने से विवाद और बढ़ गया है.
हल्द्वानी के रामलीला मैदान में 8 अगस्त को मल्लिकार्जुन खरगे की जनसभा हुई थी. इसके कुछ दिन बाद मैदान में कथित तौर पर शुद्धिकरण यज्ञ कराए जाने का मामला सामने आया. बताया गया कि 11 अगस्त को कुछ लोगों ने मैदान की सफाई कराने के साथ यज्ञ किया.
कांग्रेस ने इसे दलित समाज से जोड़ते हुए बीजेपी पर निशाना साधा. वहीं बीजेपी की ओर से सफाई दी गई कि सभा के बाद मैदान में गंदगी और कूड़ा-कचरा फैल गया था. साथ ही कार्यक्रम के दौरान कथित तौर पर आपत्तिजनक और जिहादी नारे लगाए जाने का भी दावा किया गया, जिसके बाद धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचने की बात कहते हुए सफाई और यज्ञ कराया गया.
मामले ने तब और तूल पकड़ लिया जब राहुल गांधी की टिप्पणी के बाद उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई. इसके विरोध में कांग्रेस नेता और विधायक यशपाल आर्य की अगुवाई में पार्टी कार्यकर्ता पुलिस कार्यालय पहुंचे और अपनी शिकायत पर भी मुकदमा दर्ज करने की मांग की.
दलित वोट पर कांग्रेस की नजर
उत्तराखंड में लंबे समय से सत्ता से बाहर कांग्रेस इस बार सत्ता में वापसी की रणनीति बना रही है. पार्टी की ओर से दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक वर्ग को साधने की कोशिश लगातार की जा रही है. हालांकि संगठन के स्तर पर पार्टी की तस्वीर कुछ अलग दिखाई देती है.
पिछले साल नवंबर में गणेश गोदियाल को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाया गया था, जो ब्राह्मण समाज से आते हैं. वहीं पार्टी के 27 जिलाध्यक्षों में भी ठाकुर और ब्राह्मण नेताओं का दबदबा है. उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक करीब 60 फीसदी जिलाध्यक्ष इन्हीं दोनों समुदायों से हैं.
26 साल में 10 मुख्यमंत्री, लेकिन दलित चेहरा नहीं
उत्तराखंड का गठन साल 2000 में हुआ था. तब से अब तक राज्य में 10 मुख्यमंत्री बन चुके हैं. नारायण दत्त तिवारी से लेकर मौजूदा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी तक सभी मुख्यमंत्री ब्राह्मण या ठाकुर समुदाय से रहे हैं.
नारायण दत्त तिवारी राज्य के एकमात्र ऐसे मुख्यमंत्री रहे, जिन्होंने अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा किया. मौजूदा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी भी अपना कार्यकाल पूरा करने की ओर बढ़ रहे हैं. इसके अलावा राज्य के अधिकांश मुख्यमंत्रियों का कार्यकाल अपेक्षाकृत छोटा रहा.
अब तक कांग्रेस के तीन और बीजेपी के सात मुख्यमंत्री राज्य की कमान संभाल चुके हैं, लेकिन दोनों ही दलों से मुख्यमंत्री बनने वाले नेता ब्राह्मण या ठाकुर समाज से ही रहे हैं.
यशपाल आर्य पर कांग्रेस का दांव
उत्तराखंड की दलित राजनीति में यशपाल आर्य को सबसे प्रमुख चेहरों में गिना जाता है. करीब पांच दशक का राजनीतिक अनुभव रखने वाले आर्य कांग्रेस के लिए इस चुनाव में अहम भूमिका निभा सकते हैं. उन्हें मुख्यमंत्री पद के संभावित दावेदारों में भी माना जा रहा है.
यशपाल आर्य 2022 के विधानसभा चुनाव में भी मुख्यमंत्री पद की दौड़ में शामिल थे, लेकिन कांग्रेस चुनाव हार गई. इससे पहले 2012 में कांग्रेस की सत्ता में वापसी के समय भी उनका नाम मुख्यमंत्री पद के लिए चर्चा में था, लेकिन विजय बहुगुणा मुख्यमंत्री बने.
आर्य का राजनीतिक सफर भी काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है. 2017 के विधानसभा चुनाव से पहले उन्होंने कांग्रेस छोड़कर बीजेपी का दामन थाम लिया था. उस समय वह राज्य के परिवहन मंत्री थे. हालांकि करीब पांच साल बाद अक्टूबर 2021 में उन्होंने बीजेपी छोड़कर फिर कांग्रेस में वापसी कर ली.
क्या इस बार बदल सकता है इतिहास?
यशपाल आर्य की कांग्रेस में वापसी के समय ही यह चर्चा तेज हो गई थी कि पार्टी उन्हें मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनाकर दलित वोट बैंक को मजबूत कर सकती है. उस समय पंजाब में कांग्रेस ने दलित नेता चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाया था. हालांकि पंजाब में यह रणनीति चुनावी सफलता नहीं दिला सकी और बीजेपी उत्तराखंड में सत्ता बचाने में सफल रही.
इस बार कांग्रेस कथित तौर पर यशपाल आर्य को आगे रखकर चुनावी रणनीति तैयार कर रही है. माना जा रहा है कि पार्टी के स्थानीय स्तर पर इस नाम को लेकर सहमति है और अब अंतिम फैसला कांग्रेस आलाकमान को करना है.
आर्य को आगे करने के पीछे कांग्रेस की कोशिश तराई, कुमाऊं और पहाड़ी क्षेत्रों के अलग-अलग सामाजिक समीकरणों को साधने की भी मानी जा रही है.
दलित मुद्दे पर दोनों दलों की बढ़ी सक्रियता
हल्द्वानी विवाद के बाद बीजेपी और कांग्रेस दोनों दल दलित मुद्दे पर ज्यादा आक्रामक नजर आ रहे हैं. राहुल गांधी के खिलाफ मामला दर्ज होने के बाद बीजेपी ने प्रदेश के अलग-अलग जिला मुख्यालयों पर प्रदर्शन किया और राहुल गांधी का पुतला फूंका.
दूसरी ओर कांग्रेस ने राहुल गांधी के खिलाफ कार्रवाई को राजनीतिक दुर्भावना से प्रेरित बताया है. पार्टी नेताओं का कहना है कि उनके कार्यकर्ताओं की शिकायत पर कार्रवाई नहीं की जा रही, जबकि राहुल गांधी के खिलाफ शिकायत के तुरंत बाद एफआईआर दर्ज कर दी गई.
अब हल्द्वानी से शुरू हुआ यह विवाद देहरादून और दिल्ली तक पहुंच चुका है. ऐसे में विधानसभा चुनाव से पहले दलित राजनीति का यह मुद्दा आने वाले दिनों में और बड़ा सियासी रंग ले सकता है.
विधानसभा में दलित-आदिवासी प्रतिनिधित्व
उत्तराखंड की 70 सदस्यीय विधानसभा में अनुसूचित जाति के लिए 13 और अनुसूचित जनजाति के लिए 2 सीटें आरक्षित हैं. बीजेपी के पास भी दलित समुदाय से आने वाले कई विधायक हैं, जिनमें खजान दास, शक्तिलाल शाह, दुर्गेश्वर लाल और भूपाल राम टम्टा जैसे नाम शामिल हैं.
बीजेपी करीब एक दशक से उत्तराखंड की सत्ता में है और उसे आगामी चुनाव में सत्ता विरोधी माहौल की चुनौती का सामना करना पड़ सकता है. ऐसे में दलित वोट बैंक को अपने साथ बनाए रखना पार्टी के लिए बेहद अहम होगा.