KNEWS DESK- भारत की राजनीति में युवाओं की भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रही है, लेकिन Gen Z के आंदोलनों ने इस चर्चा को एक नया आयाम दे दिया है। हाल के वर्षों में 30 साल से कम उम्र के युवाओं के विरोध प्रदर्शनों ने राजनीतिक दलों का ध्यान अपनी ओर खींचा है। अब सवाल यह है कि क्या यही पीढ़ी 2029 के लोकसभा चुनाव में चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की ताकत रखती है?
जुलाई में जंतर-मंतर पर हुए प्रदर्शन के बाद बिहार, झारखंड समेत कई जगहों पर Gen Z से जुड़े विरोध देखने को मिले। इसके बाद राजनीतिक दलों ने भी युवाओं के साथ संवाद बढ़ाया। बीजेपी, कांग्रेस, सपा और बसपा समेत कई दलों के नेता Gen Z को साधने की कोशिश करते दिखाई दे रहे हैं। यहां तक कि आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने भी इस पीढ़ी से संवाद किया है।
कितनी बड़ी है Gen Z?
आमतौर पर 1997 से 2012 के बीच जन्मी पीढ़ी को Gen Z कहा जाता है। भारत में 15 से 29 साल के युवाओं की आबादी करीब 37 से 41 करोड़ के बीच बताई जाती है। 2029 के लोकसभा चुनाव तक इस आयु वर्ग का बड़ा हिस्सा मतदाता बन चुका होगा। ऐसे में युवा मतदाताओं की संख्या चुनावी नतीजों पर असर डालने के लिए पर्याप्त हो सकती है।
चुनावी विश्लेषक यशवंत देशमुख के मुताबिक, हर चुनाव में करीब 7-8 फीसदी नए मतदाता जुड़ते हैं। नए मतदाताओं का कुल चुनावी असर करीब 10 फीसदी तक पहुंच सकता है। उनके अनुमान के अनुसार 2029 में 25 से 30 फीसदी वोट Gen Z से आ सकते हैं।
युवा आंदोलन पहले भी बदल चुके हैं राजनीति
भारत में युवा आंदोलनों का चुनावी और राजनीतिक प्रभाव नया नहीं है। 1974 में गुजरात का नव निर्माण आंदोलन भ्रष्टाचार और महंगाई के खिलाफ शुरू हुआ और बाद में सरकार के लिए बड़ा संकट बना। इसी दौर में बिहार का छात्र आंदोलन जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में व्यापक आंदोलन में बदल गया। इसका असर 1977 के चुनावों में भी देखने को मिला।
1990 में मंडल आयोग की सिफारिशों के बाद विश्वविद्यालयों में आरक्षण के समर्थन और विरोध में बड़े युवा आंदोलन हुए। इसके बाद 2011 का अन्ना आंदोलन और 2012 का निर्भया आंदोलन भी युवाओं की बड़ी भागीदारी के लिए याद किए जाते हैं। अन्ना आंदोलन से आगे चलकर आम आदमी पार्टी की राजनीति को मजबूती मिली, जबकि निर्भया आंदोलन के बाद आपराधिक कानूनों में महत्वपूर्ण बदलाव हुए। 2015-16 में एफटीआईआई में गजेंद्र चौहान की नियुक्ति के विरोध में छात्रों ने लंबा आंदोलन किया। रोहित वेमुला की मौत के बाद हैदराबाद विश्वविद्यालय में हुए छात्र आंदोलन ने उच्च शिक्षा में भेदभाव और संस्थागत जवाबदेही जैसे मुद्दों को राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बनाया।
Gen Z की वोटिंग कितनी अलग हो सकती है?
विशेषज्ञों का मानना है कि Gen Z जरूरी नहीं कि अपने परिवार की राजनीतिक पसंद के आधार पर वोट करे। युवा मतदाता अपनी व्यक्तिगत सोच, रोजगार, शिक्षा, महंगाई, अवसर और सरकार के प्रदर्शन जैसे मुद्दों को प्राथमिकता दे सकता है। Gen Z की एक खास विशेषता यह भी है कि वह सरकार के काम के साथ-साथ यह भी देख सकती है कि सरकार ने क्या नहीं किया। यदि कोई सरकार लंबे समय तक सत्ता में रहती है तो उस दौरान पैदा और बड़ी हुई पीढ़ी के लिए वही सरकार उसकी पूरी राजनीतिक स्मृति का हिस्सा बन जाती है।
इसलिए 2029 में युवा मतदाताओं की भूमिका केवल संख्या तक सीमित नहीं रहेगी। असली चुनौती राजनीतिक दलों के सामने यह होगी कि वे Gen Z के सवालों, नाराजगी और उम्मीदों को कितना समझ पाते हैं और उन्हें अपनी राजनीति में कितनी जगह देते हैं।