वंदे मातरम् पर कांग्रेस की पुरानी परंपरा या नया कानून? 6 छंदों को लेकर क्यों छिड़ी बहस

Knews Desk– राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ को लेकर भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस के बीच राजनीतिक बहस एक बार फिर तेज हो गई है. सवाल यह है कि क्या कांग्रेस अब भी वंदे मातरम् के केवल शुरुआती दो छंद गाने की अपनी पुरानी परंपरा को जारी रख सकती है, या नए कानूनी प्रावधानों के बाद उसे पूरा गीत गाना अनिवार्य होगा. जुलाई 2026 में राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण (संशोधन) अधिनियम में बदलाव के बाद यह मुद्दा अब केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि कानूनी बहस का विषय भी बन गया है.

नए संशोधन के तहत राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रगान, राष्ट्रीय ध्वज और संविधान की तरह कानूनी संरक्षण दिया गया है. गृह मंत्रालय की ओर से इसके गायन को लेकर नियम भी निर्धारित किए गए हैं. मूल गीत के सभी छह छंदों वाले पूर्ण संस्करण को गाने या बजाने की अवधि 3 मिनट 10 सेकंड यानी 190 सेकंड निर्धारित की गई है. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या कोई राजनीतिक दल या संस्था अपनी सुविधा के अनुसार इसके कुछ हिस्से ही गा सकती है.

वंदे मातरम् को लेकर कांग्रेस की पुरानी परंपरा का संबंध स्वतंत्रता आंदोलन के दौर से है. वर्ष 1937 में कांग्रेस ने इसके शुरुआती दो छंदों को स्वीकार किया था. इसकी वजह यह थी कि गीत के बाद के हिस्सों को लेकर उस समय राजनीतिक और साम्प्रदायिक स्तर पर मतभेद मौजूद थे. इसलिए सार्वजनिक कार्यक्रमों में इसके शुरुआती अंशों को ही प्राथमिकता दी गई.हालांकि, नए कानून के बाद परिस्थितियां बदल गई हैं. कानूनविदों के मुताबिक, जब किसी गीत को कानून के तहत संरक्षण प्राप्त हो जाता है, तो कोई संस्था केवल अपनी पुरानी परंपरा के आधार पर उसमें मनमाना बदलाव नहीं कर सकती. यानी अगर निर्धारित नियमों में वंदे मातरम् के पूर्ण संस्करण को गाने या बजाने की व्यवस्था है, तो उसके स्थान पर केवल चुनिंदा छंदों का इस्तेमाल करना सवालों के घेरे में आ सकता है.

वंदे मातरम् का इतिहास करीब डेढ़ सौ साल पुराना है. बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने 7 नवंबर 1875 को इसकी रचना की थी. बाद में इसे उनके प्रसिद्ध उपन्यास ‘आनंदमठ’ में शामिल किया गया. मूल रचना में छह छंद हैं. स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान यह गीत राष्ट्रवादी भावना का महत्वपूर्ण प्रतीक बन गया था और अंग्रेजी शासन के खिलाफ आंदोलनों में इसका व्यापक इस्तेमाल हुआ.आजादी के बाद भी वंदे मातरम् को विशेष सम्मान दिया गया. 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने घोषणा की थी कि स्वतंत्रता संग्राम में वंदे मातरम् की ऐतिहासिक भूमिका को देखते हुए इसे ‘जन गण मन’ के समान सम्मान दिया जाएगा. हालांकि, लंबे समय तक इसके गायन की अवधि और सभी छंदों को लेकर कोई स्पष्ट कानूनी बाध्यता नहीं थी.

अब 2026 के संशोधन के बाद इसमें बदलाव आया है. नए कानून के तहत यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर वंदे मातरम् या राष्ट्रगान के गायन को रोकता है अथवा उसके दौरान सभा में बाधा डालता है, तो इसे दंडनीय अपराध माना जा सकता है. ऐसे मामले में तीन साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों का प्रावधान बताया गया है.इसलिए अब असली सवाल यही है कि कांग्रेस अपनी पुरानी परंपरा के तहत केवल दो छंद गाती है या नए कानूनी प्रावधानों के मुताबिक पूरे वंदे मातरम् का पालन करती है. राजनीतिक बयानबाजी के बीच इस मुद्दे पर कानून और परंपरा के टकराव ने बहस को और दिलचस्प बना दिया है.

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