KNEWS DESK- पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का असर अब ग्लोबल ऑयल मार्केट पर साफ दिखाई देने लगा है। कच्चे तेल की कीमतों में एक बार फिर तेजी आई है और ब्रेंट क्रूड का भाव 90 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया है। अमेरिका और ईरान के बीच 60 दिन के संघर्ष विराम की अवधि खत्म होने के बाद बाजार में सप्लाई को लेकर चिंता बढ़ गई है।
कच्चे तेल की कीमतों में होने वाली हर बड़ी हलचल भारत के लिए भी महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि देश अपनी जरूरत का एक बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। ऐसे में अगर तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो इसका असर देश के आयात बिल, परिवहन लागत और महंगाई पर पड़ सकता है।
90 डॉलर के पार पहुंचा ब्रेंट क्रूड
ग्लोबल मार्केट में ब्रेंट क्रूड वायदा 7 सेंट यानी 0.08 फीसदी की मामूली बढ़त के साथ 90.94 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया। वहीं अमेरिकी WTI क्रूड में 53 सेंट यानी 0.63 फीसदी की तेजी दर्ज की गई और इसकी कीमत 85.03 डॉलर प्रति बैरल रही। दोनों प्रमुख क्रूड बेंचमार्क अपने हालिया कारोबारी सत्रों में कई हफ्तों के उच्च स्तर पर पहुंच गए। बाजार में निवेशकों की नजर अब पश्चिम एशिया की स्थिति और आगे होने वाली कूटनीतिक बातचीत पर है।
अमेरिका-ईरान तनाव फिर बढ़ा
तेल की कीमतों में तेजी के पीछे सबसे बड़ी वजह अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव माना जा रहा है। दोनों देशों के बीच हुआ 60 दिन का संघर्ष विराम 17 अगस्त को समाप्त हो गया। इस समझौते का उद्देश्य दोनों देशों को बातचीत के जरिए स्थायी समाधान तलाशने का समय देना था। लेकिन निर्धारित अवधि खत्म होने तक किसी नए समझौते पर सहमति नहीं बन पाई। इसके बाद बाजार में यह आशंका बढ़ गई कि क्षेत्र में तनाव और बढ़ सकता है। तनाव बढ़ने की स्थिति में तेल उत्पादन और उसकी वैश्विक सप्लाई प्रभावित होने का खतरा रहता है। यही वजह है कि निवेशक क्रूड की कीमतों में संभावित और तेजी को लेकर सतर्क हैं।
होर्मुज स्ट्रेट पर भी बाजार की नजर
पश्चिम एशिया में तेल की सप्लाई को लेकर सबसे बड़ी चिंताओं में से एक होर्मुज जलडमरूमध्य है। यह समुद्री मार्ग वैश्विक तेल व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। क्षेत्र में किसी भी तरह की सैन्य गतिविधि या सुरक्षा संबंधी समस्या से इस रास्ते से होने वाली तेल आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका रहती है। बाजार में ऐसी आशंकाएं बढ़ते ही क्रूड की कीमतों पर तुरंत असर देखने को मिलता है। ING के विश्लेषकों के मुताबिक अमेरिकी रुख और होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा को लेकर बनी चिंताओं ने भी तेल बाजार की धारणा को प्रभावित किया है।
भारत पर क्या होगा असर?
कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेजी भारत के लिए चिंता का विषय हो सकती है। भारत अपनी घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए बड़ी मात्रा में कच्चे तेल का आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने पर देश का आयात बिल बढ़ सकता है। इसके अलावा महंगे कच्चे तेल का असर केवल पेट्रोल और डीजल तक सीमित नहीं रहता। परिवहन और माल ढुलाई की लागत बढ़ने पर इसका प्रभाव खाद्य पदार्थों से लेकर रोजमर्रा की कई दूसरी वस्तुओं तक पहुंच सकता है। अगर तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनी रहती हैं, तो इससे महंगाई का दबाव बढ़ने की आशंका भी पैदा हो सकती है।
आगे क्या देखना होगा?
फिलहाल ग्लोबल ऑयल मार्केट की दिशा मुख्य रूप से अमेरिका-ईरान संबंधों, पश्चिम एशिया में सुरक्षा स्थिति और होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़ी गतिविधियों पर निर्भर करेगी।
अगर तनाव कम होता है और सप्लाई सामान्य रहती है, तो कीमतों पर दबाव घट सकता है। लेकिन तनाव और बढ़ने की स्थिति में कच्चे तेल की कीमतों में और तेजी देखने को मिल सकती है। ऐसे में आने वाले दिनों में क्रूड की कीमतों के साथ-साथ भारत में ईंधन कीमतों, महंगाई और आम लोगों के घरेलू बजट पर भी बाजार की नजर रहेगी।