KNEWS DESK- जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में 2026-27 का एडमिशन प्रोसेस अब डेप्रिवेशन पॉइंट्स के साथ आगे बढ़ सकेगा। दिल्ली हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने 14 अगस्त के अंतरिम आदेश में किए गए उस बदलाव को संशोधित कर दिया है, जिसके चलते JNU को डेप्रिवेशन पॉइंट्स के आधार पर एडमिशन देने से रोक दिया गया था। हालांकि, इन आधार पर होने वाले एडमिशन का अंतिम परिणाम संबंधित याचिका के फैसले पर निर्भर करेगा।
JNU में एडमिशन के लिए सिर्फ CUET स्कोर ही एकमात्र आधार नहीं है। यूनिवर्सिटी की डेप्रिवेशन पॉइंट्स पॉलिसी के तहत कुछ उम्मीदवारों को उनकी सामाजिक और भौगोलिक पृष्ठभूमि के आधार पर अतिरिक्त अंक दिए जाते हैं। इन अंकों को एडमिशन मेरिट तैयार करते समय ध्यान में रखा जाता है।
14 अगस्त को जस्टिस जसमीत सिंह की एकल पीठ ने इस व्यवस्था पर अंतरिम रोक लगा दी थी। कोर्ट ने प्रथम दृष्टया सवाल उठाया था कि CUET जैसी प्रतियोगी परीक्षा का परिणाम परीक्षा के बाद अतिरिक्त अंकों के जरिए बदलना कितना उचित है। इस आदेश के बाद JNU की एडमिशन प्रक्रिया प्रभावित हुई थी।
इसके बाद JNU ने इस आदेश के खिलाफ अपील की। मंगलवार को चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस करिया की डिवीजन बेंच ने मामले पर सुनवाई करते हुए यूनिवर्सिटी को फिलहाल अपने 2026-27 ई-प्रॉस्पेक्टस के अनुसार एडमिशन प्रक्रिया आगे बढ़ाने की अनुमति दे दी।
क्या होते हैं JNU के Deprivation Points?
डेप्रिवेशन पॉइंट्स JNU की एक पुरानी एडमिशन पॉलिसी का हिस्सा हैं। इनका उद्देश्य देश के अलग-अलग और अपेक्षाकृत पिछड़े इलाकों से आने वाले छात्रों को प्रतिनिधित्व देने में मदद करना है। JNU के 2026-27 ई-प्रॉस्पेक्टस के मुताबिक, उम्मीदवारों को अधिकतम 12 डेप्रिवेशन पॉइंट्स दिए जा सकते हैं। ये पॉइंट्स मुख्य रूप से उम्मीदवार की पिछली शिक्षा और उसके स्कूलिंग जिले की निर्धारित श्रेणी के आधार पर दिए जाते हैं।
यूनिवर्सिटी के प्रॉस्पेक्टस में जिलों को विभिन्न सामाजिक-आर्थिक मानकों के आधार पर क्वार्टाइल श्रेणियों में रखा गया है। इनमें महिला निरक्षरता, कृषि श्रमिकों की हिस्सेदारी, ग्रामीण आबादी और घरों में शौचालय की उपलब्धता जैसे मानकों को शामिल किया गया है।
अधिकतम 12 पॉइंट्स का मिल सकता है लाभ
JNU की मौजूदा नीति के तहत पात्र उम्मीदवारों को अलग-अलग परिस्थितियों में डेप्रिवेशन पॉइंट्स मिलते हैं। उदाहरण के तौर पर क्वार्टाइल जिलों से संबंधित उम्मीदवारों और कुछ विशेष श्रेणियों के उम्मीदवारों को अतिरिक्त लाभ दिया जाता है। इसके अलावा, JNU के प्रॉस्पेक्टस में कश्मीरी प्रवासियों के लिए 5 डेप्रिवेशन पॉइंट्स और महिला/ट्रांसजेंडर उम्मीदवारों के लिए निर्धारित अतिरिक्त पॉइंट्स का भी प्रावधान है। हालांकि यह लाभ सभी पाठ्यक्रमों पर लागू नहीं होता।
कोर्ट ने पहले क्यों लगाई थी रोक?
एकल पीठ के सामने मुख्य सवाल यह था कि CUET में प्राप्त स्कोर को परीक्षा समाप्त होने के बाद डेप्रिवेशन पॉइंट्स के जरिए प्रभावी रूप से बढ़ाना प्रतियोगी परीक्षा की निष्पक्षता को प्रभावित करता है या नहीं। अदालत ने प्रथम दृष्टया माना था कि यदि यूनिवर्सिटी प्रवेश परीक्षा में मिले स्कोर में बाद में अतिरिक्त अंक जोड़ती है, तो इससे परीक्षा के मूल परिणाम में बदलाव होता है। इसी आधार पर 14 अगस्त के अंतरिम आदेश में एडमिशन प्रक्रिया पर रोक लगाई गई थी।
JNU ने हाईकोर्ट में क्या दलील दी?
JNU ने अपनी पॉलिसी का बचाव करते हुए कहा कि डेप्रिवेशन पॉइंट्स कोई नई व्यवस्था नहीं है। यूनिवर्सिटी के मुताबिक यह नीति लंबे समय से लागू है और इसका उद्देश्य एडमिशन में देश के विभिन्न क्षेत्रों से छात्रों का बेहतर प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है। डिवीजन बेंच ने भी सुनवाई के दौरान इस बात पर ध्यान दिया कि डेप्रिवेशन पॉइंट्स की व्यवस्था JNU में 1974 से चली आ रही है और एकल पीठ के अंतरिम आदेश के कारण एडमिशन प्रक्रिया प्रभावित हुई है।
अभी छात्रों के लिए क्या मतलब है?
डिवीजन बेंच के आदेश के बाद JNU फिलहाल 2026-27 के ई-प्रॉस्पेक्टस में दिए गए नियमों के मुताबिक एडमिशन प्रक्रिया जारी रख सकता है। इसमें डेप्रिवेशन पॉइंट्स से संबंधित प्रावधान भी शामिल हैं, जिन्हें अदालत में चुनौती दी गई है। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि इस व्यवस्था के तहत किए जाने वाले एडमिशन का भविष्य संबंधित रिट याचिका के अंतिम फैसले पर निर्भर करेगा। डिवीजन बेंच ने एकल पीठ से मामले की सुनवाई में तेजी लाने और इसे जल्द निपटाने का अनुरोध भी किया है।
छात्रों को क्या करना चाहिए?
फिलहाल JNU में एडमिशन की तैयारी कर रहे छात्रों को यूनिवर्सिटी के आधिकारिक नोटिस और 2026-27 ई-प्रॉस्पेक्टस के आधार पर आगे बढ़ना चाहिए। डेप्रिवेशन पॉइंट्स को लेकर अंतिम कानूनी स्थिति अभी तय नहीं हुई है, इसलिए छात्रों को भविष्य में आने वाले कोर्ट के आदेशों और JNU की एडमिशन अपडेट्स पर नजर रखनी होगी। यानी फिलहाल राहत JNU और छात्रों दोनों को मिली है, लेकिन डेप्रिवेशन पॉइंट्स की वैधता पर अंतिम फैसला अभी बाकी है।