Census 2027 में पहली बार देश की सभी जातियों की होगी गिनती, लेकिन 2011 के अनुभव ने खड़ी कर दी है वर्गीकरण की बड़ी चुनौती
Knews Desk– भारत में होने वाली जनगणना 2027 कई मायनों में ऐतिहासिक होने जा रही है। आजादी के बाद पहली बार सामान्य जनगणना में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के अलावा सभी जातियों की जानकारी भी दर्ज की जाएगी। जनगणना की प्रश्नावली में जाति/जनजाति से जुड़ा सवाल 10वें नंबर पर रखा गया है।
हालांकि, जाति की गिनती शुरू होने से पहले ही सबसे बड़ा सवाल उठ खड़ा हुआ है। सवाल यह नहीं है कि देश में कितनी जातियां हैं, बल्कि यह है कि अलग-अलग जातियों, उपजातियों और स्थानीय नामों को आखिर किस तरह दर्ज और वर्गीकृत किया जाएगा।
जातिगत आंकड़ों को लेकर सबसे बड़ी चुनौती 2011 की सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना (SECC) के दौरान सामने आई थी। उस समय लोगों से जाति संबंधी जानकारी ली गई थी और करीब 46 लाख अलग-अलग जाति-संबंधी नाम सामने आए थे।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं था कि देश में 46 लाख अलग-अलग जातियां मौजूद हैं। इन जवाबों में जातियों के साथ उपजाति, स्थानीय पहचान, समानार्थी नाम, उपनाम, कुल और गोत्र जैसी जानकारियां भी शामिल थीं।
नतीजा यह हुआ कि एक ही समुदाय के लिए कई अलग-अलग नाम दर्ज हो गए। बाद में इन नामों को एक समान सामाजिक श्रेणी में रखना बड़ी प्रशासनिक चुनौती बन गया।
सिर्फ जाति पूछना काफी नहीं
यही वजह है कि Census 2027 में केवल लोगों से उनकी जाति का नाम पूछना पर्याप्त नहीं होगा। असली चुनौती उस जवाब को एक मानकीकृत श्रेणी में बदलने की होगी।
मसलन, किसी व्यक्ति से जाति पूछे जाने पर वह ‘कोइरी’ लिख सकता है, कोई ‘काछी’, कोई ‘मुराई’ और कोई ‘शाक्य’। ऐसे में सवाल उठेगा कि इन सभी नामों को अलग-अलग जातियां माना जाएगा या इन्हें किसी व्यापक सामाजिक समूह का हिस्सा माना जाएगा।
अगर हर स्थानीय नाम को अलग जाति मान लिया गया तो एक बड़े समुदाय की आबादी कई छोटे-छोटे नामों में बंट सकती है। वहीं, अगर अलग-अलग नामों को एक ही जाति के अंतर्गत रखा जाता है, तो संबंधित समुदाय अपनी अलग सामाजिक पहचान के आंकड़े की मांग कर सकता है।
जाति वर्गीकरण में कई स्तर की चुनौती
जनगणना के दौरान जाति संबंधी डेटा को लेकर कई पेच सामने आ सकते हैं। पहला सवाल जाति की परिभाषा का है। यह तय करना होगा कि किस नाम को स्वतंत्र जाति माना जाए और किसे उपजाति या पर्यायवाची नाम। दूसरी चुनौती स्थानीय नामों की है। एक ही समुदाय को अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों में अलग नामों से जाना जाता है। तीसरा मुद्दा उपजाति का है। यदि उपजातियों को अलग-अलग गिना गया तो बड़े सामाजिक समूहों की आबादी अलग-अलग हिस्सों में बंट सकती है।
चौथी चुनौती पहचान की है। अगर कई उपजातियों को एक व्यापक जाति के तहत रखा जाता है तो कुछ समुदाय इसका विरोध कर सकते हैं। पांचवां मुद्दा सरकारी नीतियों से जुड़ा है। जातिगत आंकड़े सामने आने के बाद अलग-अलग समुदाय अपनी आबादी के आधार पर आरक्षण और सरकारी योजनाओं में हिस्सेदारी की मांग कर सकते हैं। छठी चुनौती राज्यों की अलग-अलग श्रेणियां हैं। किसी राज्य में एक समुदाय OBC सूची में हो सकता है, जबकि दूसरे राज्य में उसकी स्थिति अलग हो सकती है।
बिहार और तेलंगाना के अनुभव से क्या सीख?
जाति सर्वे के मामले में बिहार और तेलंगाना के मॉडल का भी जिक्र किया जाता रहा है। बिहार ने 2023 में जाति आधारित सर्वे कराया था। वहां जातियों को प्रशासनिक व्यवस्था और उपलब्ध सरकारी रिकॉर्ड से जोड़कर व्यवस्थित करने की कोशिश की गई।
तेलंगाना में भी सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक और रोजगार से जुड़े पहलुओं के साथ जाति संबंधी सर्वे कराया गया। राज्य में पिछड़े वर्गों को अलग-अलग श्रेणियों में बांटने की व्यवस्था पहले से मौजूद है। ऐसे मॉडल में जाति के नाम को केवल एक जवाब के रूप में दर्ज करने के बजाय उसे व्यापक प्रशासनिक वर्गीकरण से जोड़ने की कोशिश की जाती है।
लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर यही काम कहीं ज्यादा जटिल होगा। भारत में भाषाई, क्षेत्रीय और सामाजिक विविधता बहुत ज्यादा है। एक ही समुदाय के अलग-अलग इलाकों में अलग नाम प्रचलित हो सकते हैं।
2011 की गलती दोहराने का खतरा
2011 के अनुभव ने यह साफ कर दिया था कि करोड़ों लोगों से जाति की जानकारी जुटाना एक चरण है, जबकि उस जानकारी को सही तरीके से वर्गीकृत करना उससे कहीं बड़ी चुनौती है।
अगर Census 2027 में जातियों के नाम दर्ज करने के साथ उनके वर्गीकरण के लिए स्पष्ट और पारदर्शी व्यवस्था नहीं बनाई गई, तो एक बार फिर बड़ी संख्या में अलग-अलग नाम सामने आ सकते हैं। इसके बाद यह तय करना मुश्किल हो सकता है कि कौन-सा नाम किस जाति या सामाजिक समूह के अंतर्गत आता है।
क्यों महत्वपूर्ण है जाति जनगणना?
Census 2027 से मिलने वाला जातिगत डेटा देश की सामाजिक और आर्थिक नीतियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। इससे सरकार को अलग-अलग समुदायों की जनसंख्या और उनकी सामाजिक स्थिति को समझने में मदद मिल सकती है। इसी आधार पर आरक्षण, कल्याणकारी योजनाओं और संसाधनों के वितरण को लेकर भी नई बहस शुरू हो सकती है।
लेकिन इस पूरी प्रक्रिया की विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करेगी कि जातियों के नाम किस तरीके से दर्ज किए जाते हैं और बाद में उनका वर्गीकरण कैसे किया जाता है।
यानी Census 2027 में असली चुनौती जाति गिनने की नहीं, बल्कि जाति को सही तरीके से गिनने और वर्गीकृत करने की है। अगर प्रक्रिया वैज्ञानिक, पारदर्शी और एक समान रही, तो देश को पहली बार व्यापक राष्ट्रीय जातिगत तस्वीर मिल सकती है। लेकिन अगर वर्गीकरण को लेकर स्पष्टता नहीं रही, तो करोड़ों जवाब जुटाने के बाद भी सही जातिवार आंकड़ा तैयार करना बड़ी चुनौती बना रहेगा।