KNEWS DESK- सावन का महीना भगवान शिव की भक्ति के लिए सबसे पवित्र माना जाता है। इस दौरान बड़ी संख्या में लोग मांसाहार, शराब और तामसिक भोजन से दूरी बना लेते हैं। इसे आमतौर पर धार्मिक परंपरा माना जाता है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इसके पीछे कुछ वैज्ञानिक और स्वास्थ्य संबंधी कारण भी हो सकते हैं।
डायटिशियन पायल दत्त के अनुसार, सावन बारिश का मौसम होता है और इस दौरान वातावरण में नमी काफी बढ़ जाती है। ऐसे में मांस, मछली और चिकन जैसी चीजें यदि सही तापमान पर न रखी जाएं या ठीक से न पकाई जाएं, तो उनमें बैक्टीरिया तेजी से पनप सकते हैं। इससे फूड पॉइजनिंग और पेट के संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है।
आयुर्वेद में भी माना गया है कि वर्षा ऋतु के दौरान शरीर की पाचन क्षमता सामान्य दिनों की तुलना में कमजोर हो जाती है। ऐसे में भारी और देर से पचने वाले भोजन को पचाने में अधिक समय लग सकता है, जिससे गैस, अपच और पेट संबंधी परेशानियां हो सकती हैं। इसलिए इस मौसम में हल्का, ताजा और आसानी से पचने वाला भोजन करने की सलाह दी जाती है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि पहले के समय में रेफ्रिजरेटर जैसी सुविधाएं उपलब्ध नहीं थीं। ऐसे में बारिश के मौसम में मांसाहारी भोजन जल्दी खराब होने की संभावना रहती थी। इसी कारण इस दौरान नॉनवेज से परहेज करना स्वास्थ्य की दृष्टि से भी एक सुरक्षित आदत माना जाता था।
बारिश का मौसम कई पशु-पक्षियों और जलीय जीवों के प्रजनन का समय भी होता है। इसलिए पारंपरिक रूप से इस अवधि में उनके शिकार या अत्यधिक उपयोग से बचने की परंपरा भी विकसित हुई, जिसे प्रकृति के संतुलन से जोड़कर देखा जाता है।
हालांकि, विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि ऐसा कोई वैज्ञानिक या चिकित्सीय नियम नहीं है कि सावन में हर व्यक्ति के लिए नॉनवेज खाना पूरी तरह प्रतिबंधित हो। यदि कोई मांसाहार करता है, तो उसे यह सुनिश्चित करना चाहिए कि भोजन ताजा हो, अच्छी तरह पकाया गया हो और पूरी स्वच्छता के साथ तैयार किया गया हो। स्वास्थ्य के लिहाज से सबसे महत्वपूर्ण बात भोजन की गुणवत्ता और सुरक्षा है, चाहे वह शाकाहारी हो या मांसाहारी।