Knews Desk– अवध के आखिरी नवाब और कला-प्रेमी शासक वाजिद अली शाह अपनी शायरी, संगीत, नृत्य और सांस्कृतिक विरासत के लिए जितने प्रसिद्ध थे, उतना ही उनका दुर्लभ जानवरों और पक्षियों के प्रति प्रेम भी चर्चा का विषय था। लेकिन 21 सितंबर 1887 को उनके निधन के बाद अंग्रेजी हुकूमत ने उनकी शाही विरासत को व्यवस्थित तरीके से खत्म करने की योजना बनाई। इसी क्रम में उनके प्रसिद्ध चिड़ियाघर की भी नीलामी कर दी गई। उस समय यह चिड़ियाघर उनकी सबसे मूल्यवान संपत्तियों में गिना जाता था, जिसमें देश-विदेश से लाए गए दुर्लभ जानवर और पक्षी मौजूद थे।वाजिद अली शाह को 1856 में अंग्रेजों ने सत्ता से हटाकर कलकत्ता (अब कोलकाता) के गार्डन रीच इलाके में नजरबंद जैसी स्थिति में रहने के लिए मजबूर कर दिया था। अपने जीवन के अंतिम लगभग तीन दशक उन्होंने यहीं बिताए। इस दौरान उन्होंने अपने महल के आसपास एक भव्य चिड़ियाघर तैयार कराया, जहां एशिया, अफ्रीका और अन्य देशों से लाए गए दुर्लभ जीव-जंतुओं को रखा गया था। कहा जाता है कि जीवन के अंतिम वर्षों में उन्हें अपने चिड़ियाघर के जानवरों और पक्षियों से बेहद लगाव हो गया था और वे उनकी देखभाल पर बड़ी रकम खर्च करते थे।
ब्रिटिश सरकार पहले ही तय कर चुकी थी कि वाजिद अली शाह की मृत्यु के बाद उनके किसी भी उत्तराधिकारी को शाही विरासत या “बादशाह” की उपाधि का अधिकार नहीं मिलेगा। अंग्रेजों को आशंका थी कि यदि शाही परिवार को अधिक महत्व दिया गया तो अवध में फिर से असंतोष या विद्रोह की स्थिति पैदा हो सकती है। इसलिए उनके निधन के तुरंत बाद गार्डन रीच स्थित महल की संपत्तियों की नीलामी शुरू कर दी गई।इस नीलामी में सबसे ज्यादा आकर्षण का केंद्र नवाब का चिड़ियाघर बना। इसमें मौजूद दुर्लभ जानवरों और पक्षियों को खरीदने के लिए कई रियासतों के प्रतिनिधि, विदेशी मेहमान और संस्थाएं आगे आईं। बहावलपुर के नवाब और अफगानिस्तान के राजदूत भी इस नीलामी में शामिल हुए। उस दौर के प्रसिद्ध प्रकृतिविद और अलीपुर चिड़ियाघर के निदेशक राम ब्रह्म सान्याल ने भी कई जानवर खरीदे। उन्होंने करीब 2,000 रुपये में दो गैंडे खरीदे, जबकि एक बड़े आकार के दुर्लभ चूहे के लिए 60 रुपये चुकाए। उस समय यह रकम काफी बड़ी मानी जाती थी।
फरवरी 1888 तक चली इस नीलामी से अंग्रेजी सरकार को करीब 30,000 रुपये की आय हुई। यह केवल आर्थिक लेन-देन नहीं था, बल्कि अवध की शाही विरासत को समाप्त करने की एक राजनीतिक प्रक्रिया भी थी। जिन जानवरों और पक्षियों को वाजिद अली शाह ने वर्षों की मेहनत और खर्च से इकट्ठा किया था, वे अलग-अलग खरीदारों के पास चले गए और उनका अनोखा चिड़ियाघर इतिहास का हिस्सा बन गया।इतिहासकारों के अनुसार, वाजिद अली शाह केवल शासक ही नहीं, बल्कि कला और प्रकृति के बड़े संरक्षक भी थे। उन्होंने संगीत, नृत्य, रंगमंच और साहित्य के साथ-साथ पशु-पक्षियों के संरक्षण में भी गहरी रुचि दिखाई। उनके चिड़ियाघर में गैंडे, दुर्लभ हिरण, विदेशी पक्षी, बंदर, मोर और कई अनोखी प्रजातियों के जीव मौजूद थे। उस समय ऐसा निजी संग्रह बहुत कम शासकों के पास देखने को मिलता था।
वाजिद अली शाह के निधन के बाद अंग्रेजों ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि उनके साथ ही “बादशाह” की उपाधि समाप्त हो जाएगी और उनके किसी उत्तराधिकारी को यह दर्जा नहीं मिलेगा। हालांकि ब्रिटिश प्रशासन को उनके बड़े बेटे शहजादा कमर क़द्र से संभावित दावेदारी का डर था, इसलिए शाही संपत्तियों का जल्द से जल्द निपटारा कर दिया गया।आज वाजिद अली शाह का चिड़ियाघर इतिहास के पन्नों में दर्ज एक अनोखी विरासत माना जाता है। यह केवल दुर्लभ जानवरों का संग्रह नहीं था, बल्कि उस दौर की शाही संस्कृति, सौंदर्यबोध और प्रकृति प्रेम का प्रतीक भी था। उनकी मृत्यु के बाद हुई नीलामी ने एक ऐसे अध्याय का अंत कर दिया, जो अवध की शान और नवाबी संस्कृति की पहचान माना जाता था।