Knews Desk– सिक्किम के नामची जिले में निर्माणाधीन टनल में हुए दर्दनाक हादसे ने एक बार फिर देश की बड़ी इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में होने वाली देरी और सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सोमवार को पहाड़ी से भारी मात्रा में मलबा और चट्टानें खिसककर टनल के प्रवेश द्वार पर आ गिरीं, जिससे अंदर काम कर रहे मजदूर फंस गए। हादसे में अब तक 8 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि 27 मजदूरों को सुरक्षित निकालने के लिए राहत और बचाव अभियान लगातार जारी है।यह टनल NHPC (नेशनल हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर कॉर्पोरेशन) की तीस्ता स्टेज-VI जलविद्युत परियोजना का हिस्सा है। यह परियोजना सिक्किम के नामची जिले के सामरदुंग-झोलुंगेय क्षेत्र में स्थित है और इसका उद्देश्य तीस्ता नदी की जल क्षमता का उपयोग कर 500 मेगावाट बिजली उत्पादन करना है। परियोजना को देश के पूर्वोत्तर क्षेत्र में ऊर्जा उत्पादन बढ़ाने की महत्वपूर्ण योजना माना जाता है।
इस परियोजना की शुरुआत करीब 21 वर्ष पहले की गई थी। प्रारंभिक योजना के अनुसार इसे कुछ वर्षों में पूरा कर लिया जाना था, लेकिन समय के साथ इसकी लागत और निर्माण अवधि दोनों लगातार बढ़ती गईं। शुरुआत में अपेक्षाकृत कम लागत वाली इस परियोजना का अनुमानित खर्च बढ़कर अब 8,449 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है। इसके बावजूद परियोजना अभी तक पूरी नहीं हो सकी है।विशेषज्ञों के अनुसार, इस लंबे विलंब के पीछे कई कारण रहे हैं। सिक्किम का दुर्गम और भूस्खलन प्रभावित पहाड़ी इलाका निर्माण कार्य के लिए हमेशा चुनौतीपूर्ण रहा है। भारी बारिश, कमजोर भूगर्भीय संरचना, बार-बार होने वाले भूस्खलन, पर्यावरणीय मंजूरियों में देरी, तकनीकी चुनौतियां और निर्माण कार्य में आने वाली बाधाओं ने परियोजना की गति को प्रभावित किया। इसके अलावा कोविड-19 महामारी के दौरान काम प्रभावित होने से भी निर्माण कार्य में अतिरिक्त देरी हुई।जिस टनल में हादसा हुआ, उसका उपयोग जलविद्युत परियोजना के लिए नदी के पानी को नियंत्रित तरीके से पावर हाउस तक पहुंचाने के लिए किया जाना है। इस प्रक्रिया के माध्यम से पानी के दबाव से टरबाइन चलेंगी और बिजली का उत्पादन होगा। परियोजना पूरी होने के बाद इससे पूर्वोत्तर क्षेत्र सहित देश के अन्य हिस्सों को भी अतिरिक्त बिजली उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी।
हादसे के बाद मौके पर राष्ट्रीय आपदा मोचन बल (NDRF), राज्य आपदा प्रबंधन दल, पुलिस, सेना और NHPC की टीमें संयुक्त रूप से राहत एवं बचाव अभियान में जुटी हैं। टनल के मुहाने पर जमा मलबा हटाने और अंदर फंसे मजदूरों तक सुरक्षित पहुंचने के लिए भारी मशीनों की मदद ली जा रही है। अधिकारियों का कहना है कि प्राथमिकता सभी फंसे हुए लोगों को सुरक्षित बाहर निकालने की है।इस घटना ने एक बार फिर बड़े निर्माण कार्यों में सुरक्षा मानकों और जोखिम प्रबंधन की आवश्यकता को रेखांकित किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि हिमालयी क्षेत्रों में चल रही परियोजनाओं में आधुनिक भूवैज्ञानिक अध्ययन, रियल-टाइम मॉनिटरिंग और मजबूत सुरक्षा उपायों को और प्रभावी बनाना जरूरी है, ताकि भविष्य में इस तरह की घटनाओं को रोका जा सके।फिलहाल पूरे देश की नजर बचाव अभियान पर टिकी है। साथ ही यह सवाल भी उठ रहा है कि दो दशक से अधिक समय और हजारों करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद यह महत्वाकांक्षी परियोजना अब तक पूरी क्यों नहीं हो सकी। सरकार और संबंधित एजेंसियों के सामने अब न केवल राहत कार्य को सफलतापूर्वक पूरा करने, बल्कि परियोजना की प्रगति और सुरक्षा व्यवस्था की व्यापक समीक्षा करने की भी चुनौती है।