Knews Desk– अवध के आखिरी नवाब वाजिद अली शाह अपनी शानो-शौकत, कला प्रेम और विलासितापूर्ण जीवन के लिए जितने प्रसिद्ध थे, उतने ही चर्चित उनकी आर्थिक बदहाली के किस्से भी हैं। सत्ता से बेदखल होने के बाद उन्हें ब्रिटिश सरकार की ओर से सालाना 12 लाख रुपये की पेंशन मिलती थी, जो उस दौर में ब्रिटिश महारानी को मिलने वाले प्रिवी पर्स से भी अधिक मानी जाती थी। इसके बावजूद उनके शाही खर्च इतने अधिक थे कि उन्हें साहूकारों, व्यापारियों और यहां तक कि अपने कर्मचारियों से भी कर्ज़ लेना पड़ा। हालात ऐसे हो गए कि कर्ज़ चुकाने के लिए उन्हें अपनी संपत्ति गिरवी रखने की नौबत आ गई। इसी दौर में उनके एक वफादार किन्नर सेवक दियानतउद्दौला ने न सिर्फ 34 हजार रुपये का कर्ज़ माफ कर दिया, बल्कि अपनी पूरी जमीन-जायदाद भी वसीयत के जरिए नवाब के नाम कर दी। यह घटना आज भी वफादारी की अनूठी मिसाल मानी जाती है।
1856 में अंग्रेजों ने अवध का विलय कर वाजिद अली शाह को सत्ता से हटा दिया और उन्हें कलकत्ता (अब कोलकाता) के गार्डन रीच में रहने के लिए भेज दिया। वहां ब्रिटिश सरकार ने उनके रहने के लिए इमारतें और सालाना पेंशन की व्यवस्था की थी, लेकिन उनके खर्च लगातार बढ़ते गए। जब साहूकार मनोहर दास ने अपने बकाया की वसूली के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया और फैसला उसके पक्ष में आया, तब नवाब के सलाहकारों ने गार्डन रीच स्थित ‘सुल्तान खाना’ भवन को गिरवी रखकर कर्ज़ चुकाने का सुझाव दिया। इस खबर ने तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड कैनिंग को चिंतित कर दिया। उन्होंने नवाब को फिजूलखर्ची रोकने और अपने आसपास के लोगों से सतर्क रहने की सलाह दी, लेकिन इसका कोई असर नहीं हुआ।
1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेज नहीं चाहते थे कि आर्थिक तंगी के कारण अवध के पूर्व नवाब जनता की सहानुभूति हासिल करें और किसी नए असंतोष का केंद्र बन जाएं। इसी वजह से 27 मार्च 1862 को ‘अवध के बादशाह अधिनियम, 1862’ लागू किया गया। इस कानून के तहत वाजिद अली शाह को अधिकांश दीवानी और फौजदारी मामलों में अदालत के अधिकार क्षेत्र से बाहर कर दिया गया। सरकार का मानना था कि जब अदालत के जरिए कर्ज़ की वसूली संभव नहीं होगी तो कोई भी उन्हें नया कर्ज़ देने से बचेगा। हालांकि, इसका उल्टा असर हुआ और कई कर्मचारियों ने इस व्यवस्था का फायदा उठाना शुरू कर दिया।
नवाब के भरोसेमंद कर्मचारी बाजार से सामान खरीदकर ऊंचे दामों पर उन्हें बेचते थे और पूरा हिसाब-किताब मुंशी सफदर अली के हाथ में था। 1866 में उसकी मृत्यु के बाद पता चला कि मामूली वेतन पाने वाला सफदर भारी संपत्ति का मालिक बन चुका था और दावा किया गया कि नवाब पर उसका करीब 40 लाख रुपये बकाया है। बाद में कई अन्य कर्मचारियों ने भी लाखों रुपये के दावे पेश किए, जबकि उनकी मासिक तनख्वाह महज 20 से 50 रुपये थी। ब्रिटिश एजेंट मेजर हरबर्ट और अमीर अली ने इन दावों की जांच कराई, जिसके बाद लगभग 50 लाख रुपये के दावों में से अधिकांश फर्जी या बढ़ा-चढ़ाकर पेश किए गए पाए गए। जांच के बाद वास्तविक बकाया करीब 7.80 लाख रुपये रह गया, जिसे वाजिद अली शाह ने किस्तों में चुकाने की सहमति दी।
इन सभी घटनाओं के बीच किन्नर दियानतउद्दौला की वफादारी सबसे अलग नजर आती है। जब कई लोग नवाब की आर्थिक कमजोरी का फायदा उठाकर अपनी दौलत बढ़ाने में लगे थे, तब दियानतउद्दौला ने उनके ऊपर चढ़ा 34 हजार रुपये का कर्ज़ पूरी तरह माफ कर दिया। इतना ही नहीं, उन्होंने अपनी जमीन-जायदाद भी वसीयत के जरिए वाजिद अली शाह के नाम कर दी। इतिहास में यह घटना इस बात का प्रमाण मानी जाती है कि वाजिद अली शाह के जीवन में जहां विश्वासघात और आर्थिक संकट की कई कहानियां हैं, वहीं उनके प्रति निस्वार्थ निष्ठा और समर्पण के भी ऐसे उदाहरण मौजूद हैं, जो आज भी लोगों को हैरान कर देते हैं।