Knews Desk- इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश में ग्राम प्रधानों को प्रशासक के रूप में बनाए रखने के फैसले पर गंभीर सवाल उठाए हैं। कोर्ट ने इस व्यवस्था को डिवीजन बेंच के आदेश का उल्लंघन बताया है और इसे अदालत की अवमानना की श्रेणी में भी माना है। हालांकि, इस मामले में फिलहाल किसी तरह की अंतरिम रोक नहीं लगाई गई है।
यह मामला उस याचिका से जुड़ा है, जिसमें ग्राम पंचायतों में प्रशासक नियुक्त करने के सरकारी आदेश को चुनौती दी गई है। जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की सिंगल बेंच में शुक्रवार को इस याचिका पर सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा कि ग्राम प्रधानों को प्रशासक के रूप में बने रहने की अनुमति नहीं दी जा सकती, क्योंकि यह पहले से जारी न्यायिक आदेशों के खिलाफ प्रतीत होता है।
कोर्ट ने राज्य सरकार से इस मामले में विस्तृत जवाब दाखिल करने को कहा है। विशेष रूप से ओबीसी आयोग की रिपोर्ट को रिकॉर्ड पर लाने के लिए एक अंतिम अवसर दिया गया है, ताकि स्थिति स्पष्ट हो सके। साथ ही अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि अगर सरकार ने किसी आयोग का गठन किया है, तो उसकी पूरी जानकारी और कार्य योजना कोर्ट में प्रस्तुत की जाए, जिसमें पंचायत चुनाव की संभावित समय सीमा भी स्पष्ट रूप से बताई जाए।
याचिकाकर्ता अरविंद राठौर ने अदालत में यह मांग रखी है कि ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाए रखने के बजाय जल्द से जल्द त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव कराए जाएं। उनका कहना है कि मौजूदा व्यवस्था लोकतांत्रिक प्रक्रिया के खिलाफ है और इससे स्थानीय शासन प्रणाली प्रभावित हो रही है।
गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश में ग्राम पंचायतों का कार्यकाल 26 मई 2026 को समाप्त हो चुका है। इसके बाद राज्य सरकार ने नई व्यवस्था लागू करते हुए मौजूदा ग्राम प्रधानों को ही प्रशासक के रूप में नियुक्त कर दिया था। सरकार का तर्क है कि जब तक ओबीसी आरक्षण से संबंधित आयोग की रिपोर्ट और चुनावी प्रक्रिया पूरी नहीं हो जाती, तब तक प्रशासनिक व्यवस्था बनाए रखना जरूरी है।
पंचायत चुनाव मई 2026 में प्रस्तावित थे, लेकिन मतदाता सूची समय पर तैयार न हो पाने और ओबीसी आरक्षण निर्धारण के लिए आयोग गठन की प्रक्रिया लंबित रहने के कारण चुनाव समय पर नहीं हो सके। सरकार ने इसके लिए पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया है, जिसे अपनी रिपोर्ट देने के लिए छह महीने का समय दिया गया है। यह आयोग हर जिले की सामाजिक और आर्थिक स्थिति का अध्ययन करेगा।
इसी आधार पर राज्य सरकार ने मौजूदा ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाए रखने का निर्णय लिया, जिसे अब हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है। याचिका में कहा गया है कि यह व्यवस्था संवैधानिक प्रावधानों और न्यायालय के पूर्व आदेशों के विपरीत है। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 13 जुलाई को दोपहर 2 बजे निर्धारित की है। अब सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि राज्य सरकार इस मामले में क्या विस्तृत हलफनामा दाखिल करती है और कोर्ट आगे क्या रुख अपनाता है।