Knews Desk- ऑनलाइन शॉपिंग और इलेक्ट्रॉनिक्स खरीदते समय अक्सर “नो-कॉस्ट EMI” का ऑफर ग्राहकों को आकर्षित करता है। यह ऑफर सुनने में बेहद फायदेमंद लगता है क्योंकि इसमें बिना ब्याज के आसान किश्तों में भुगतान करने का दावा किया जाता है। लेकिन वित्तीय विशेषज्ञों का कहना है कि कई बार ऐसे ऑफर लोगों को जरूरत से ज्यादा खर्च करने के लिए प्रेरित कर देते हैं।
दरअसल, नो-कॉस्ट EMI में ग्राहक को अलग से ब्याज नहीं देना पड़ता, लेकिन कई मामलों में उत्पाद की कीमत में ही ब्याज की लागत समायोजित कर दी जाती है। कुछ कंपनियां डिस्काउंट हटाकर या प्रोसेसिंग फीस जोड़कर अपनी लागत वसूल लेती हैं। ऐसे में ग्राहक को यह महसूस नहीं होता कि वह वास्तव में अतिरिक्त भुगतान कर रहा है।
EMI की सुविधा मिलने पर लोग अक्सर अपनी वास्तविक जरूरत और बजट से अधिक महंगे उत्पाद खरीद लेते हैं। कम मासिक किश्त देखकर खरीदारी आसान लगती है, लेकिन एक साथ कई EMI चलने पर मासिक खर्च का बोझ बढ़ सकता है। इससे भविष्य की बचत और वित्तीय योजनाएं प्रभावित हो सकती हैं।
क्रेडिट कार्ड पर ली गई EMI का एक और असर यह होता है कि कार्ड की उपलब्ध क्रेडिट लिमिट घट जाती है। यदि किसी आपात स्थिति में अतिरिक्त खर्च की जरूरत पड़े तो ग्राहक को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। समय पर किस्त न चुकाने पर भारी ब्याज और पेनाल्टी भी लग सकती है।
वित्तीय सलाहकारों का कहना है कि किसी भी नो-कॉस्ट EMI ऑफर का लाभ उठाने से पहले उत्पाद की वास्तविक कीमत, मिलने वाले डिस्काउंट और अन्य शुल्कों की तुलना जरूर करनी चाहिए। यदि खरीदारी आवश्यक हो और EMI आपकी आय के अनुसार हो तो यह सुविधा उपयोगी साबित हो सकती है।
नो-कॉस्ट EMI एक सुविधाजनक विकल्प जरूर है, लेकिन केवल ऑफर के आकर्षण में आकर अतिरिक्त खर्च करना आपकी वित्तीय स्थिति पर दबाव बढ़ा सकता है। इसलिए खरीदारी से पहले अपनी जरूरत और बजट का आकलन करना बेहद जरूरी है।