उत्तराखंड डेस्क रिपोर्ट, उत्तराखंड के वन्य क्षेत्रों में वनाग्नि की घटनाओं का ग्राफ दिनों दिन बढ़ता ही जा रहा है,विभागीय स्तर से भले ही वन्य क्षेत्र में बढ़ती आग की घटनाओं की रोकथाम के लिए लाख दावे किए जा रहे हो बावजूद इसके पूरी तरह से आग की घटनाओं को रोक पाने में विभागीय प्रबंधन तंत्र फेल साबित हो रहा है। देवभूमि उत्तराखंड…जहां की हरियाली, जंगल और जलस्रोत कभी प्रकृति की सबसे अनमोल धरोहर माने जाते थे…लेकिन अब वही जंगल आग की भयावह लपटों में घिरते जा रहे हैं। हर साल बढ़ती वनाग्नि की घटनाएं अब सिर्फ पर्यावरणीय संकट नहीं, बल्कि एक बड़े अस्तित्व के खतरे में बदल चुकी हैं। उत्तराखंड के वन क्षेत्रों में लगातार बढ़ रही आग की घटनाओं ने सरकार, वन विभाग और पर्यावरण विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। पहाड़ों के चीड़ के जंगलों में लगने वाली आग अब हजारों हेक्टेयर वन संपदा को नष्ट कर रही है। आग की इन घटनाओं के चलते जंगलों से उठती धुएं की काली चादर सिर्फ हरियाली को ही नहीं मिटा रही, बल्कि इंसानी जीवन, वन्य जीवों और जल स्रोतों को भी गहरे संकट में डाल रही है। विशेषज्ञ मानते हैं कि लगातार बढ़ते तापमान, कम होती वर्षा, जंगलों में सूखी पत्तियों और चीड़ की पुराल का जमाव, साथ ही मानव लापरवाही…वनाग्नि की घटनाओं को और ज्यादा भयावह बना रहे हैं। कई बार मामूली चिंगारी भी विकराल रूप लेकर पूरे जंगल को राख में तब्दील कर देती है। वनाग्नि का सबसे बड़ा असर पर्यावरण संतुलन पर पड़ रहा है। जंगलों में मौजूद लाखों पेड़-पौधे जलकर खत्म हो रहे हैं। इससे कार्बन उत्सर्जन तेजी से बढ़ रहा है. और जलवायु परिवर्तन का खतरा और गहरा हो रहा है। जो जंगल कभी ऑक्सीजन के सबसे बड़े स्रोत थे, वही अब जहरीले धुएं का कारण बनते जा रहे हैं। बढ़ती आग की घटनाओं के कारण ये खतरा सिर्फ पेड़ों तक सीमित नहीं है। जंगलों में रहने वाले तेंदुए, हिरण, भालू, पक्षी और छोटे वन्य जीव भी वनाग्नि से प्रभावित हो रहे हैं। कई वन्य जीव अपने प्राकृतिक आवास छोड़कर आबादी वाले इलाकों की ओर पलायन करने को मजबूर हो रहे हैं। यही वजह है कि पर्वतीय क्षेत्रों में मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं भी लगातार बढ़ रही हैं। वनाग्नि का असर अब भू-जल स्तर पर भी साफ दिखाई देने लगा है। पर्यावरणविदों के अनुसार जंगलों की हरियाली खत्म होने से वर्षा का जल जमीन में समाहित नहीं हो पा रहा। नतीजा…पहाड़ों के प्राकृतिक जल स्रोत और धाराएं धीरे-धीरे सूखने लगे हैं। जिन गांवों में कभी सालभर पानी उपलब्ध हुआ करता था, वहां अब पेयजल संकट गहराने लगा है।जिस पर अब राजनीति के साथ जनता के कई सवाल सरकार की और मुँह बाय खड़े है.
उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा पर्यटन और प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर करता है। लेकिन जब जंगल जलते हैं, तो उसका सीधा असर पर्यटन उद्योग पर भी पड़ता है। धुएं और प्रदूषण से पहाड़ी क्षेत्रों की प्राकृतिक सुंदरता प्रभावित होती है और पर्यटक दूर रहने लगते हैं। हालांकि वन विभाग की ओर से फायर लाइन, ड्रोन मॉनिटरिंग और त्वरित राहत टीमों जैसी व्यवस्थाएं की जा रही हैं, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि सिर्फ सरकारी प्रयास काफी नहीं होंगे। स्थानीय लोगों की भागीदारी, जंगलों की वैज्ञानिक निगरानी और वन संरक्षण के प्रति जागरूकता बेहद जरूरी है। देवभूमि के जंगल सिर्फ पेड़ नहीं…बल्कि यहां की संस्कृति, जल, जीवन और भविष्य का आधार हैं। अगर वनाग्नि की बढ़ती घटनाओं पर समय रहते काबू नहीं पाया गया…तो आने वाले वर्षों में इसका असर सिर्फ जंगलों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इंसानी अस्तित्व भी इसकी भारी कीमत चुकाएगा।वही इस पूरे मामले पर जब सवाल पूछा गया,वन मंत्री से तो पत्रकारों पर ही बिखरते नजर आए उनका ये वीडियो इस समय गंभीर मुद्दे पर बोलना काफी चर्चाओं में है. साथ ही स्थिति पर सरकार सब सामान्य करने का दावा तो करती दिखाई दे रही है.लेकिन जहां से शुरुआत की थी आज भी वही खड़ी है.यानिकि करोडो की वन सम्पदा धू धू कर दिन रात सुलग रही है.जिस पर राजनीति का पारा भी आसमान में दिखाई दे रहा है.साथ ही जंगली जानवरों का भय अलग सताता दिखाई दे रहा है.
हैरानी की बात करे तो जनपद मुख्यालय के बड़ेथी क्षेत्र में स्थित पोखु देवता मंदिर के समीप हालही में देर रात्रि जंगल में अचानक भीषण आग भड़क उठी. देर रात लगी आग ने कुछ ही समय में विकराल रूप धारण कर लिया. तेज हवाओं और सूखी वनस्पतियों के कारण आग तेजी से फैलती चली गई और इसकी लपटें आवासीय बस्ती तथा गंगोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग के बेहद करीब तक पहुंच गईं. रात के अंधेरे में जंगल से उठी आग की ऊंची लपटों और धुएं को देखकर क्षेत्र में अफरा-तफरी मच गई. स्थानीय लोगों के साथ ही आसपास ठहरे यात्रियों में भी भय का माहौल बन गया. घटना की सूचना मिलते ही अग्निशमन विभाग की टीम तत्काल मौके के लिए रवाना हुई.अब सवाल यह है,क्या उत्तराखंड के जंगलों को बचाने के लिए अब और कठोर कदम उठाने की जरूरत है? क्या जलवायु परिवर्तन और मानव लापरवाही मिलकर पहाड़ों को बंजर बना रही है?और वन महकमा जब दावे करता है.तो आखिर धरातल काम क्यों नहीं कर पता जबकि करोडो का बजट इसी काम के लिए किया जाता हो,तब भी सालो से धधकते ये जंगल क्या बारिश के इंतजार में ऐसे ही सुलगते रहेंगे।