डिजिटल डेस्क- तमिलनाडु विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों ने एक ऐसी पटकथा लिख दी है जिसकी कल्पना शायद किसी एग्जिट पोल ने भी नहीं की थी। राज्य की सबसे हाई-प्रोफाइल सीट कोलाथुर से मुख्यमंत्री और डीएमके सुप्रीमो एम.के. स्टालिन चुनाव हार गए हैं। उन्हें अभिनेता से नेता बने विजय की पार्टी ‘तमिलनाडु वेत्री कझगम’ (TVK) के उम्मीदवार वी.एस. बाबू ने एक कड़े मुकाबले में शिकस्त दी है। यह न केवल स्टालिन की व्यक्तिगत हार है, बल्कि तमिलनाडु की ‘द्रविड़ियन राजनीति’ के लिए एक बड़ा टर्निंग पॉइंट माना जा रहा है।
कोलाथुर का किला ढहा: 2011 के बाद पहली हार
एम.के. स्टालिन साल 2011 से लगातार कोलाथुर सीट का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। 2021 के चुनाव में उन्होंने यहाँ 70,000 से अधिक वोटों के भारी अंतर से जीत दर्ज की थी, लेकिन 2026 में ‘विजय लहर’ ने इस अभेद्य किले को ढहा दिया। शुरुआती राउंड से ही TVK के उम्मीदवार वी.एस. बाबू ने बढ़त बना ली थी, जो अंत तक बरकरार रही। वी.एस. बाबू, जो पहले खुद डीएमके में रह चुके हैं, उन्होंने स्थानीय मुद्दों और बेरोजगारी को आधार बनाकर मुख्यमंत्री को उनके ही घर में पटखनी दे दी।
क्यों हारी DMK?
राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि स्टालिन के ‘द्रविड़ियन मॉडल’ पर विजय के ‘लोकप्रिय वादों’ और युवाओं के बीच उनकी जबरदस्त अपील भारी पड़ी। विजय ने अपने घोषणापत्र में मुफ्त एलपीजी सिलेंडर, महिलाओं के लिए मासिक सहायता और बेरोजगार स्नातकों के लिए भत्ते जैसे जो वादे किए, उन्होंने पहली बार वोट देने वाले युवाओं और महिलाओं को अपनी ओर खींच लिया। इसके अलावा, सत्ता विरोधी लहर (Anti-incumbency) ने भी डीएमके के 15 से ज्यादा मंत्रियों को हार की कगार पर पहुंचा दिया।
एक नए युग की शुरुआत
तमिलनाडु की राजनीति पिछले कई दशकों से डीएमके और अन्नाद्रमुक (AIADMK) के इर्द-गिर्द घूमती रही है। लेकिन एम.के. स्टालिन की हार और विजय की जीत ने यह साबित कर दिया है कि राज्य की जनता अब एक तीसरे विकल्प को स्वीकार कर चुकी है। चेन्नई, जो कभी डीएमके का सबसे मजबूत गढ़ हुआ करता था, वहां भी TVK ने पूरी तरह से क्लीन स्वीप कर दिया है।