डिजिटल डेस्क- आबकारी नीति मामले में जज बदलने की मांग को लेकर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की अर्जी पर दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस स्वर्णाकांत शर्मा ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने याचिका खारिज करते हुए न्यायपालिका की निष्पक्षता, संवैधानिक जिम्मेदारी और अदालत की प्रक्रिया को लेकर कई महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं। सुनवाई के दौरान जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने कहा कि जब उन्होंने इस मामले में आदेश लिखना शुरू किया, तो कोर्ट रूम में पूरी तरह सन्नाटा था। उन्होंने कहा कि उस समय उन्हें एक जज के तौर पर अपनी जिम्मेदारी का गहरा एहसास हुआ, क्योंकि उन्होंने भारत के संविधान की शपथ ली है। उन्होंने यह भी कहा कि उस क्षण उन्हें महसूस हुआ कि उनकी चुप्पी भी एक परीक्षा की तरह है, और सवाल सिर्फ उन पर नहीं बल्कि पूरी न्यायपालिका की निष्पक्षता और उसकी गरिमा पर भी उठाया जा रहा है।
कोर्ट के आदेश को किसी उच्च अदालत ने रद्द नहीं किया- जस्टिस शर्मा
जज ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि केजरीवाल की गिरफ्तारी से जुड़े मामले में केवल गिरफ्तारी की आवश्यकता का प्रश्न ही बड़ी बेंच को भेजा गया था, जबकि अंतरिम जमानत का आदेश पहले ही दिया जा चुका था। उन्होंने यह भी कहा कि उनके कोर्ट के आदेश को किसी उच्च अदालत ने रद्द नहीं किया है, इसलिए यह तर्क नहीं दिया जा सकता कि संबंधित जज मामले को सुनने के लिए उपयुक्त नहीं हैं। जस्टिस शर्मा ने यह भी कहा कि किसी भी आधार पर, जैसे किसी राजनीतिक नेता के सार्वजनिक बयानों के कारण, किसी जज के मामले से अलग होने की मांग करना केवल कल्पना पर आधारित होगा। उन्होंने कहा कि अदालत का इस बात पर कोई नियंत्रण नहीं है कि कोई नेता सार्वजनिक रूप से क्या बयान देता है, और न ही न्यायालय ऐसे बयानों को नियंत्रित कर सकता है।
34 सालों में किसी भी तरह के आरोपों से प्रभावित हो निभाया अपना कर्तव्य- जस्टिस
अपने फैसले में जज ने यह भी कहा कि उन्होंने इस मामले पर निर्णय लेने का फैसला इसलिए किया क्योंकि यह संस्थान की गरिमा से जुड़ा प्रश्न था। उन्होंने अपने 34 वर्षों के न्यायिक करियर का हवाला देते हुए कहा कि वे किसी भी तरह के आरोपों से प्रभावित हुए बिना अपना कर्तव्य निभाती रही हैं और आगे भी ऐसा ही करेंगी। जस्टिस शर्मा ने यह भी कहा कि सुनवाई के दौरान कई तरह की बातें सामने आईं, लेकिन यह दावा किया गया कि जज की ईमानदारी पर सवाल नहीं उठाया गया, बल्कि केवल “भय” के आधार पर ट्रांसफर की मांग की गई है। उन्होंने इसे न्यायपालिका को चुनौती देने जैसा बताया। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पहले कई मामलों में केजरीवाल और उनकी पार्टी के नेताओं को अंतरिम राहत दी गई थी, लेकिन तब कभी भी जज की निष्पक्षता पर सवाल नहीं उठाए गए। उदाहरण देते हुए जज ने कहा कि जब आदेश पक्ष में होते हैं, तब कोई आपत्ति नहीं होती, लेकिन विपरीत निर्णय आने पर सवाल उठाए जाते हैं, जो न्यायिक प्रक्रिया के खिलाफ है।