पश्चिम एशिया संकट पर सर्वदलीय बैठक, सरकार ने साधी एकजुटता की अपील, विपक्ष ने उठाए सवाल

डिजिटल डेस्क- पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच केंद्र सरकार ने बुधवार को संसद भवन में एक अहम सर्वदलीय बैठक बुलाई। बैठक की अध्यक्षता रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने की, जिसका उद्देश्य सभी राजनीतिक दलों को मौजूदा हालात से अवगत कराना और देश के सामने खड़ी चुनौतियों पर साझा रणनीति तैयार करना था। बैठक में विभिन्न दलों के नेताओं ने हिस्सा लिया। कांग्रेस की ओर से तारिक अहमद और मुकुल वासनिक मौजूद रहे, जबकि जेडीयू से ललन सिंह और संजय झा शामिल हुए। हालांकि, तृणमूल कांग्रेस ने इस बैठक से दूरी बनाई, वहीं कांग्रेस नेता राहुल गांधी भी इसमें शामिल नहीं हुए।

ऊर्जा और अर्थव्यवस्था पर चर्चा

सूत्रों के अनुसार, बैठक में पश्चिम एशिया के हालात का भारत पर पड़ने वाले प्रभाव पर विस्तार से चर्चा हुई। खासतौर पर ऊर्जा आपूर्ति, बढ़ती महंगाई और सप्लाई चेन पर संभावित असर को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच विचार-विमर्श हुआ। इससे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में कहा था कि पश्चिम एशिया का यह संघर्ष भारत की ऊर्जा सुरक्षा और अर्थव्यवस्था को लंबे समय तक प्रभावित कर सकता है। उन्होंने सभी दलों से मिलकर इस चुनौती का सामना करने की अपील की। बैठक के दौरान विपक्षी दलों ने सरकार को घेरते हुए कहा कि केवल सर्वदलीय बैठक पर्याप्त नहीं है। उन्होंने मांग की कि इस गंभीर मुद्दे पर संसद में विस्तृत बहस कराई जाए, ताकि सभी पक्षों के विचार सामने आ सकें। कुछ विपक्षी नेताओं ने ईरान के साथ भारत के संबंधों और संभावित एलपीजी संकट को लेकर भी सवाल उठाए। उनका कहना था कि सरकार को इन मुद्दों पर स्पष्ट रणनीति सामने रखनी चाहिए।

राहुल गांधी की गैरमौजूदगी पर सियासत

राहुल गांधी के बैठक में शामिल न होने को लेकर राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई। भाजपा सांसद शशांक मणि ने विपक्ष पर निशाना साधते हुए कहा कि ऐसे समय में सभी दलों को जिम्मेदारी के साथ काम करना चाहिए। उन्होंने कहा, “यह संकट देश के बाहर से आया है और इससे निपटने के लिए सभी को मिलकर काम करना होगा। ऐसे समय में किसी दल का दूरी बनाना या बैठक में शामिल न होना गलत संदेश देता है।” जहां सत्तापक्ष इस मुद्दे पर राष्ट्रीय एकता की जरूरत पर जोर दे रहा है, वहीं विपक्ष सरकार की विदेश नीति और तैयारी पर सवाल उठा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पश्चिम एशिया संकट जैसे अंतरराष्ट्रीय मुद्दे पर देश के भीतर एकजुटता जरूरी है, लेकिन राजनीतिक मतभेद भी अपनी जगह बने हुए हैं।

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