K News desktop- डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये में शुक्रवार को बड़ी गिरावट दर्ज की गई और यह अपने इतिहास के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। वैश्विक वित्तीय बाजारों में जारी उथल-पुथल के बीच एक डॉलर की कीमत 92.39 रुपये तक पहुंच गई, जो अब तक का सबसे कमजोर स्तर माना जा रहा है। इससे पहले पिछले कारोबारी सत्र में भी रुपये ने 92.3575 का निचला स्तर छुआ था, लेकिन शुक्रवार की गिरावट ने इस रिकॉर्ड को भी पीछे छोड़ दिया।
रुपये में आई इस तेज गिरावट के पीछे सबसे बड़ा कारण मध्य पूर्व में जारी तनाव और युद्ध की स्थिति को माना जा रहा है। खास तौर पर Iran से जुड़े संघर्ष ने वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता बढ़ा दी है। इस तनाव का सीधा असर कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ा है, जो तेजी से बढ़कर 100 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गई हैं। युद्ध से पहले कच्चा तेल लगभग 70 डॉलर प्रति बैरल के आसपास स्थिर था, लेकिन मौजूदा हालात ने ऊर्जा बाजारों को झटका दिया है।
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयातित कच्चे तेल से पूरा करता है। ऐसे में तेल की कीमतों में अचानक आई तेजी देश की अर्थव्यवस्था के लिए दबाव बढ़ाने वाली साबित हो रही है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होता है तो भारत को इसे खरीदने के लिए ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। इससे विदेशी मुद्रा की मांग बढ़ती है और रुपये पर दबाव बढ़ जाता है, जिसके कारण उसकी कीमत गिरने लगती है।
मध्य पूर्व में संघर्ष शुरू होने के बाद से अब तक भारतीय मुद्रा में एक प्रतिशत से ज्यादा की गिरावट दर्ज की जा चुकी है। महंगे कच्चे तेल और कमजोर रुपये का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। ऊर्जा की लागत बढ़ने से परिवहन, उत्पादन और अन्य क्षेत्रों में खर्च बढ़ जाता है, जिसका असर महंगाई और आर्थिक गतिविधियों पर भी देखने को मिलता है। यही वजह है कि मौजूदा हालात भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ी चुनौती बनते नजर आ रहे हैं।
हालांकि इस नकारात्मक माहौल के बीच एक राहत की बात यह है कि दुनिया के कई अन्य उभरते बाजारों की मुद्राओं की तुलना में भारतीय रुपये की स्थिति अभी भी अपेक्षाकृत बेहतर बनी हुई है। इसके पीछे भारतीय रिज़र्व बैंक की सक्रिय भूमिका को अहम माना जा रहा है। केंद्रीय बैंक समय-समय पर विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप कर रहा है ताकि रुपये की गिरावट को अचानक और ज्यादा गहरा होने से रोका जा सके।
विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक मध्य पूर्व के हालात सामान्य नहीं होते और कच्चे तेल की कीमतों में नरमी नहीं आती, तब तक वैश्विक बाजारों में अस्थिरता बनी रह सकती है। ऐसे में आने वाले दिनों में रुपये और ऊर्जा बाजारों की दिशा काफी हद तक भू-राजनीतिक घटनाक्रम पर निर्भर करेगी।