KNEWS DESK- आज पूरे देश में चैत्र माह की कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि के मौके पर होली का पावन त्योहार मनाया जा रहा है। लोग रंग, गुलाल और अबीर के साथ एक-दूसरे को गले मिल रहे हैं, और हर कोने में उत्साह और उल्लास दिखाई दे रहा है। गुलाल, हो-हल्ला और मस्ती—यही तस्वीर आमतौर पर हमारे मन में होली का नाम सुनते ही उभरती है।
लेकिन भारत में कुछ ऐसे भी स्थान हैं जहां होली के दिन सन्नाटा पसरा रहता है। धार्मिक परंपराओं, पौराणिक मान्यताओं और श्रापों के कारण इन गांवों में यह पर्व नहीं मनाया जाता। आइए जानते हैं कुछ ऐसे अनोखे गांव और उनके रहस्य।
रूद्रप्रयाग जिले के कुरझां और क्विली गांव में पिछले डेढ़ सौ सालों से होली का उत्सव नहीं मनाया जाता। स्थानीय लोग मानते हैं कि उनकी आराध्य देवी त्रिपुर सुंदरी शोर-शराबे और हुड़दंग से प्रसन्न नहीं होतीं। देवी के प्रति भक्ति और सम्मान के कारण इन गांवों में होली के दिन शांति रहती है।
बोकारो जिले के कसमार ब्लॉक में दुर्गापुर गांव में भी सदी से अधिक समय से होली नहीं खेली जाती। लोक मान्यता है कि लगभग 100 साल पहले यहां के राजा के पुत्र की मौत होली के दिन हुई थी, और बाद में राजा भी उसी दिन चल बसे। मृत्यु से पहले राजा ने आदेश दिया था कि गांव में होली नहीं मनाई जाएगी। गांव वाले अब भी इस परंपरा का पालन करते हैं और मानते हैं कि इसे तोड़ने वाले को विपत्ति या मृत्यु का सामना करना पड़ सकता है।
गुजरात के बनासकांठा जिले में स्थित रामसन (प्राचीन नाम रामेश्वर) गांव में पिछले 200 वर्षों से होली नहीं खेली जाती। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान राम वनवास के दौरान इस गांव से गुजरे थे। वहीं कुछ लोककथाओं में कहा जाता है कि संतों ने यहां के घमंडी राजा के कारण गांव पर श्राप दे दिया था। तब से यहां होली का उत्सव आयोजित नहीं किया जाता।
दक्षिण भारत में, खासकर तमिलनाडु में होली के समय ‘मासी मागम’ का त्योहार मनाया जाता है। इस दिन पितरों की आत्माएं पवित्र नदियों और तालाबों में स्नान करने आती हैं। पितरों के प्रति श्रद्धा अर्पित करने की परंपरा के कारण यहां उत्तर भारत जैसी होली की धूम देखने को नहीं मिलती।