शिव शंकर सविता- सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी BSNL एक बार फिर सुर्खियों में है। वजह है एक वरिष्ठ अधिकारी के प्रयागराज दौरे के लिए तैयार किया गया ऐसा ‘रॉयल प्रोटोकॉल’, जिसने सोशल मीडिया पर आते ही भूचाल ला दिया। 50 कर्मचारियों की तैनाती, स्नान किट से लेकर तौलिए-अंडरवियर तक की व्यवस्था और मिनट-टू-मिनट कार्यक्रम… सब कुछ इतना विस्तृत कि लोगों ने इसे “वीआईपी संस्कृति की पराकाष्ठा” करार दे दिया। मामला 19 फरवरी को जारी एक आधिकारिक पत्र से जुड़ा है, जो डिप्टी जनरल मैनेजर स्तर से जारी हुआ था। इसमें दो दिन के दौरे के लिए 50 से अधिक अधिकारियों और कर्मचारियों को 21 अलग-अलग जिम्मेदारियां सौंपी गई थीं। आदेश के मुताबिक, प्रयागराज रेलवे स्टेशन पर औपचारिक स्वागत से लेकर त्रिवेणी संगम स्नान, मंदिर दर्शन, नाव की व्यवस्था, भोजन, परिवहन और निजी सुविधाओं तक का पूरा खाका तैयार किया गया था।
तौलिया, अंडरगारमेंट्स, तेल, कंघी के व्यवस्था करने की भी लगाई गई ड्यूटी
सबसे ज्यादा चर्चा जिस बात की हुई, वह थी ‘स्नान किट’ की सूची। इसमें तौलिया, अंडरगारमेंट्स, तेल, कंघी और अन्य निजी उपयोग की वस्तुएं शामिल थीं। इतना ही नहीं, स्नान के बाद इस्तेमाल की गई वस्तुओं की पैकिंग, रखरखाव और लेखा-जोखा तक के निर्देश दिए गए थे। अलग-अलग टीमों को आतिथ्य, लॉजिस्टिक्स, एस्कॉर्ट सेवा और जलपान की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। गाड़ियों में पानी की बोतल, चिप्स और चॉकलेट रखने तक की हिदायतें थीं। दौरे का कार्यक्रम मिनट-टू-मिनट तय किया गया था रेलवे स्टेशन से संगम तक, संगम से मंदिर दर्शन तक और वहां से भोजन व विश्राम तक। फोटो क्लिकिंग की अलग जिम्मेदारी तय थी, ताकि पूरे दौरे का दस्तावेजीकरण सुनिश्चित हो सके। एक तरह से यह प्रोटोकॉल किसी सरकारी निरीक्षण से ज्यादा ‘राजकीय आतिथ्य’ जैसा नजर आ रहा था।
बीएसएनएल के घाटे के बाद भी शाही प्रोटोकॉल पर यूजर्स ने उठाए सवाल
सोशल मीडिया पर दस्तावेज वायरल होते ही सवाल उठने लगे क्या सार्वजनिक संसाधनों का इस्तेमाल इस तरह किया जाना चाहिए? खासकर तब, जब कंपनी को हालिया तिमाही में 1300 करोड़ रुपये से अधिक का घाटा हुआ है। यूजर्स ने तंज कसते हुए लिखा कि “घाटे में कंपनी, लेकिन स्वागत में कोई कमी नहीं।” विवाद ने तूल पकड़ा तो आखिरकार प्रस्तावित दौरा रद्द कर दिया गया। BSNL के जनसंपर्क अधिकारी ने कार्यक्रम निरस्त होने की पुष्टि की, हालांकि व्यवस्थाओं को लेकर कोई विस्तृत टिप्पणी नहीं की गई। लेकिन सवाल अब भी कायम हैं क्या सरकारी उपक्रमों में वीआईपी संस्कृति अब भी इतनी गहरी है कि व्यक्तिगत सुविधाओं के लिए दर्जनों कर्मचारियों की ड्यूटी लगाई जाए?