KNEWS DESK- शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती एक बार फिर सुर्खियों में हैं। प्रयागराज के माघ मेले में मौनी अमावस्या के दिन संगम स्नान को लेकर उनका प्रशासन से टकराव हो गया। मामला इतना बढ़ा कि साधु-संत, प्रशासन और राजनीति आमने-सामने आ गए। हालांकि यह पहली बार नहीं है जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद किसी विवाद के केंद्र में आए हों। उनके मुखर विचार और सनातन परंपराओं की खुली पैरवी पहले भी कई बार चर्चा का विषय बन चुकी है।
कब और कहां हुआ शंकराचार्य का जन्म?
शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का मूल नाम उमाशंकर उपाध्याय है। उनका जन्म 15 अगस्त 1969 को उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले की पट्टी तहसील के ब्राह्मणपुर गांव में हुआ था। वे एक ब्राह्मण परिवार से आते हैं। प्रारंभिक शिक्षा प्रतापगढ़ में ही हुई, लेकिन बचपन से ही उनका रुझान धर्म, शास्त्र और बौद्धिक विषयों की ओर रहा।
उच्च शिक्षा और धार्मिक अध्ययन के लिए वे गुजरात पहुंचे। वहीं उनका संपर्क स्वामी करपात्री जी महाराज के शिष्य ब्रह्मचारी राम चैतन्य से हुआ। यही मुलाकात उनके जीवन का निर्णायक मोड़ साबित हुई। उनके मार्गदर्शन में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने संस्कृत और शास्त्रों का गहन अध्ययन शुरू किया।इसके बाद वे वाराणसी आए और संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से शास्त्री और आचार्य की उपाधि प्राप्त की। इस दौरान वे छात्र राजनीति में भी सक्रिय रहे और 1994 में छात्रसंघ चुनाव जीतकर नेतृत्व क्षमता का परिचय दिया।
कैसे बने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती?
वेद, उपनिषद, वेदांत, पुराण, आयुर्वेद और संस्कृत व्याकरण में पारंगत होने के बाद उन्होंने 1990 के दशक में संन्यास लिया। स्वामी करपात्री जी महाराज के अस्वस्थ होने पर वे अंतिम समय तक उनकी सेवा में लगे रहे। इसी दौरान उनका संपर्क ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती से हुआ। 15 अप्रैल 2003 को उन्हें दंड संन्यास की दीक्षा मिली और तभी उनका नाम पड़ा स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती।
गंगा, गौ और धर्म पर बेबाक राय
स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद केवल धर्माचार्य ही नहीं, बल्कि आंदोलनों की मुखर आवाज भी रहे हैं। 2008 में गंगा को राष्ट्रीय नदी घोषित करने की मांग को लेकर उन्होंने अनशन किया। गौहत्या, मंदिरों की स्वायत्तता और धर्म में सरकारी हस्तक्षेप जैसे मुद्दों पर वे लगातार मुखर रहे। उनके बयान अक्सर सियासी हलकों में भी हलचल मचा देते हैं।
धार्मिक मुद्दों के साथ-साथ वे पर्यावरण संरक्षण को लेकर भी सजग रहे हैं। जोशीमठ भूमि धंसाव के मामले में उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में PIL दाखिल की और जलवायु परिवर्तन के खतरों पर गंभीर चिंता जताई। इससे साफ है कि उनका दृष्टिकोण केवल धर्म तक सीमित नहीं है।
कैसे बने ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य?
सितंबर 2022 में स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती के निधन के बाद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती को ज्योतिर्मठ (जोशीमठ) का शंकराचार्य घोषित किया गया। हालांकि इस पद को लेकर तभी से विवाद और कानूनी चुनौतियां सामने आती रही हैं।
माघ मेले में क्या हुआ पूरा विवाद?
प्रयागराज के माघ मेले में मौनी अमावस्या के दिन विवाद उस वक्त भड़का, जब शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद करीब 200 शिष्यों के साथ रथ और पालकी में सवार होकर संगम स्नान के लिए निकले। प्रशासन ने अत्यधिक भीड़ का हवाला देते हुए उन्हें आगे बढ़ने से रोक दिया और पैदल स्नान करने को कहा। इस पर शिष्यों ने विरोध किया, हालात तनावपूर्ण हो गए और हल्की झड़प भी हुई।
इसके बाद शंकराचार्य ने साफ कहा, “जब संतों के साथ ऐसा व्यवहार होगा, तो मैं स्नान नहीं करूंगा।” उन्होंने संगम स्नान से इनकार कर धरना शुरू कर दिया।
शंकराचार्य पद की वैधता पर उठे सवाल
विवाद के बाद मेला प्रशासन ने नोटिस जारी कर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के शंकराचार्य पद की वैधता पर सवाल उठा दिए। प्रशासन का कहना है कि यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। वहीं शंकराचार्य का तर्क है कि “शंकराचार्य पद का फैसला न अदालत करती है, न राजनीति — इसका निर्णय धर्मपीठ और परंपराएं करती हैं।”
फिलहाल प्रयागराज के माघ मेले में धर्म और राजनीति का तापमान चढ़ा हुआ है। यह विवाद कब और कैसे शांत होगा, इस पर सबकी निगाहें टिकी हैं।