करवा चौथ का व्रत 29 अक्टूबर 2026, गुरुवार को रखा जा रहा है। इस दिन सुहागिन महिलाएं पति की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना के साथ निर्जला उपवास करती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, करवा चौथ की पूजा के दौरान व्रत कथा पढ़ने और सुनने का विशेष महत्व है। आइए जानते हैं वीरावती, करवा माता और भगवान शिव-माता पार्वती से जुड़ी पारंपरिक कथाएं और उनका धार्मिक महत्व।
KNEWS DESK- हिंदू धर्म में करवा चौथ को सुहाग और दांपत्य जीवन से जुड़ा महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है। इस दिन विवाहित महिलाएं सूर्योदय से पहले सरगी ग्रहण करने के बाद व्रत शुरू करती हैं। दिनभर निर्जला उपवास रखने के बाद शाम को भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश की पूजा की जाती है। इसके बाद महिलाएं चंद्रमा के दर्शन करके अर्घ्य अर्पित करती हैं और व्रत का पारण करती हैं।
करवा चौथ पर व्रत कथा का पाठ करना भी परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। मान्यता है कि इन कथाओं में पति-पत्नी के प्रेम, विश्वास, समर्पण और अखंड सौभाग्य का संदेश मिलता है। इस अवसर पर वीरावती और उसके सात भाइयों की कथा, करवा माता की कथा और भगवान शिव-माता पार्वती से जुड़ी कथा पढ़ी और सुनी जाती है।
वीरावती और उसके सात भाइयों की कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन समय में वेद शर्मा नाम के एक ब्राह्मण रहते थे। उनके सात पुत्र और एक पुत्री थी, जिसका नाम वीरावती था। सात भाइयों की इकलौती बहन होने के कारण वीरावती सभी की बहुत प्रिय थी। विवाह के बाद जब उसकी पहली करवा चौथ आई, तो वह अपने मायके में थी। उसने अपने पति की लंबी उम्र की कामना करते हुए निर्जला व्रत रखा।दिनभर भूखी-प्यासी रहने के कारण शाम तक वीरावती की तबीयत बिगड़ने लगी। अपनी बहन को परेशान देखकर उसके सातों भाई चिंतित हो गए। वे उसे भूख-प्यास से व्याकुल नहीं देख पा रहे थे। इसलिए उन्होंने एक पेड़ के पीछे दीपक जलाकर छलनी की मदद से चंद्रमा निकलने जैसा दृश्य बना दिया और वीरावती से कहा कि चांद निकल आया है।
भाइयों की बात पर विश्वास करके वीरावती ने दीपक की रोशनी को चंद्रमा समझ लिया और अर्घ्य देकर व्रत खोल लिया। लोककथा के अनुसार, भोजन का पहला ग्रास खाते ही उसे छींक आ गई, दूसरे ग्रास में बाल निकल आया और तीसरा ग्रास खाने से पहले ही उसे अपने पति की मृत्यु का समाचार मिल गया। यह सुनकर वीरावती दुखी होकर विलाप करने लगी। कथा के अनुसार, वीरावती को इंद्राणी ने बताया कि असली चंद्रमा को अर्घ्य दिए बिना व्रत खोलने के कारण उसका व्रत खंडित हो गया था। इसके बाद वीरावती ने पूरे वर्ष श्रद्धापूर्वक व्रत और पूजा की। अगली करवा चौथ पर उसने विधि-विधान से उपवास रखा और चंद्रमा को अर्घ्य दिया। मान्यता है कि उसकी श्रद्धा और तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान ने उसके पति को पुनर्जीवन प्रदान किया। इस कथा के माध्यम से करवा चौथ पर नियमपूर्वक व्रत रखने और चंद्रमा को अर्घ्य देने का महत्व बताया जाता है।
करवा माता की कथा
करवा माता से जुड़ी लोककथा में एक पतिव्रता स्त्री का वर्णन मिलता है, जिसका नाम करवा था। वह अपने पति से बहुत प्रेम करती थी और उसकी सेवा करती थी। एक दिन उसका पति नदी में स्नान करने गया, जहां एक मगरमच्छ ने उसका पैर पकड़ लिया। संकट में फंसे पति की आवाज सुनकर करवा तुरंत नदी के पास पहुंची। कथा के अनुसार, करवा ने अपने पतिव्रत धर्म और दृढ़ विश्वास के बल पर मगरमच्छ को कच्चे सूती धागे से बांध दिया। इसके बाद वह यमराज के पास पहुंची और उनसे मगरमच्छ को दंड देने तथा अपने पति को जीवनदान देने की प्रार्थना की। करवा ने अपने संकल्प और साहस से यमराज को अपनी बात सुनने के लिए प्रेरित किया।
करवा के अटूट प्रेम और समर्पण से प्रसन्न होकर यमराज ने मगरमच्छ का वध कर दिया और उसके पति को लंबी आयु का वरदान दिया। इस लोककथा को करवा चौथ के अवसर पर श्रद्धा के साथ पढ़ा और सुना जाता है। यह कथा प्रेम, साहस, विश्वास और कठिन परिस्थितियों में अपने जीवनसाथी का साथ निभाने का संदेश देती है।
माता पार्वती और भगवान शिव की कथा
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, माता पार्वती ने एक बार भगवान शिव से महिलाओं के सौभाग्य और सुखी वैवाहिक जीवन से जुड़े व्रत के बारे में पूछा। इसके उत्तर में भगवान शिव ने करवा चौथ व्रत के महत्व का वर्णन किया। मान्यता है कि कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि पर श्रद्धापूर्वक व्रत और पूजा करने से दांपत्य जीवन में सुख-शांति बनी रहती है।
इस परंपरा के अनुसार, करवा चौथ पर भगवान शिव, माता पार्वती, भगवान गणेश और चंद्रदेव की पूजा की जाती है। महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करती हैं। चंद्रमा के दर्शन के बाद अर्घ्य अर्पित करना और व्रत का पारण करना इस पर्व के प्रमुख अनुष्ठान माने जाते हैं।
करवा चौथ पर व्रत कथा पढ़ने का महत्व
करवा चौथ के दिन व्रत कथा पढ़ना या सुनना धार्मिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इन कथाओं में निष्ठा, प्रेम, समर्पण और विश्वास की महत्ता बताई गई है। महिलाएं पूजा के दौरान कथा सुनकर अपने परिवार की खुशहाली और वैवाहिक जीवन में सुख-शांति की कामना करती हैं।
करवा चौथ का पर्व पति-पत्नी के बीच प्रेम और आपसी विश्वास को मजबूत करने के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है। व्रत, पूजा, कथा पाठ और चंद्रमा को अर्घ्य देने की परंपराओं के साथ यह त्योहार श्रद्धा और उत्साह से मनाया जाता है।