KNEWS DESK- गणेश उत्सव के दौरान घरों और पंडालों में भगवान गणेश की विधि-विधान से पूजा की जाती है। पूजा के दौरान कलश स्थापना भी की जाती है, जिसके ऊपर नारियल रखा जाता है। गणपति विसर्जन के बाद जब बप्पा को विदाई दी जाती है, तो पूजा में इस्तेमाल हुई सामग्री को लेकर लोगों के मन में कई सवाल होते हैं। इन्हीं में से एक सवाल कलश पर रखे नारियल को लेकर भी होता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पूजा में इस्तेमाल किया गया नारियल सामान्य नारियल की तरह नहीं माना जाता। इसलिए इसे विसर्जन के बाद कूड़े में फेंकने के बजाय उचित तरीके से इस्तेमाल करने की सलाह दी जाती है। अगर नारियल खाने योग्य है, तो उसे फोड़कर प्रसाद के रूप में परिवार और अन्य लोगों में बांटा जा सकता है।
अगर नारियल खराब हो गया है या खाने योग्य नहीं बचा है, तो उसे कचरे में फेंकने के बजाय किसी साफ स्थान पर मिट्टी में दबाया जा सकता है। कुछ लोग धार्मिक आस्था के अनुसार इसे बहते जल में प्रवाहित भी करते हैं, हालांकि पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए पूजा सामग्री को नदी या जलस्रोतों में डालने से बचना बेहतर है।
अगर नारियल से अंकुर निकल आया है, तो इसे शुभ संकेत मानने की धार्मिक परंपरा भी मिलती है। ऐसे नारियल को फेंकने के बजाय गमले, बगीचे या उपयुक्त स्थान पर मिट्टी में लगाया जा सकता है। ज्योतिषीय मान्यताओं में नारियल को धन और समृद्धि से भी जोड़ा जाता है। माता लक्ष्मी की कृपा के लिए पूजा में इस्तेमाल नारियल को साफ लाल या पीले कपड़े में लपेटकर घर के मंदिर में रखने की मान्यता है। कुछ लोग इसे घर के मुख्य द्वार के पास भी रखते हैं।
धन संबंधी परेशानियों के लिए जटावाला नारियल से जुड़े उपाय भी बताए जाते हैं। मान्यता के अनुसार जटावाले नारियल पर सिंदूर से स्वस्तिक बनाकर उसे हनुमान मंदिर में अर्पित किया जाता है। इसे आर्थिक बाधाओं को दूर करने से जोड़कर देखा जाता है। कर्ज से मुक्ति के लिए भी नारियल से जुड़ा एक उपाय प्रचलित है। इसके तहत शुक्ल पक्ष के बुधवार को जटावाले नारियल को पीले कपड़े में लपेटकर पीली मिठाई और मूंग की दाल के साथ भगवान विष्णु के मंदिर में दान करने की मान्यता है।
वहीं, व्यापार में तरक्की और नकारात्मकता से बचाव के लिए नारियल को लाल या पीले कपड़े में बांधकर दुकान या घर के मुख्य दरवाजे के अंदर की ओर रखने की परंपरा भी बताई जाती है।
ध्यान देने वाली बात यह है कि ये उपाय धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताओं पर आधारित हैं। इनके प्रभाव की वैज्ञानिक पुष्टि नहीं हुई है। गणपति विसर्जन के बाद पूजा सामग्री का निपटारा करते समय स्थानीय नियमों और पर्यावरण का भी ध्यान रखना चाहिए।