उत्तराखंड डेस्क रिपोर्ट – उत्तराखंड में आगामी वर्ष 2027 में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। भले ही अभी कुछ महीनों का समय बाकी हो, लेकिन सियासी पारा अभी से हाई है। हर दल जीत के दावे कर रहा है और रणनीति बनाने में जुटा है। राज्य बनने के बाद से उत्तराखंड की राजनीति का इतिहास रहा है कि एक बार भाजपा तो एक बार कांग्रेस को सत्ता में राज़ करने का मौका मिलता आया है, लेकिन पिछले 10 सालों में तस्वीर बदली और भाजपा का दबदबा कायम है। यही कारण है कि इस बार भाजपा 60 पार का नारा दे रही है और मिशन 2027 को लेकर तैयारियों में जुटी है। जिसके लिए दिल्ली से लेकर देहरादून तक शीर्ष नेतृत्व लगातार दौड़ लगा रहा है, कार्यकर्ताओं के साथ बैठकों का दौर जारी है और जीत का मूलमंत्र दिया जा रहा है। लेकिन इन्हीं तैयारियों के बीच दो छोटे चुनावों ने बड़े संकेत दे दिए हैं। जिसे टेस्ट मैच कहा जा रहा है यानी छात्रसंघ चुनाव और सेमीफाइनल माना जा रहा है उधमसिंह नगर के किच्छा नगर पालिका चुनाव, दोनों में विपक्षी दलों को प्रचंड बहुमत मिली है। किच्छा में भाजपा को हार का सामना करना पड़ा है। इन नतीजों ने चुनावी समीकरण बदलते दिखा दिए हैं और भाजपा की चिंता बढ़ा दी है। जिसके बाद भाजपा इन चुनावों को लेकर समीक्षा करने जा रही है तो वहीं विपक्ष में जबरदस्त उत्साह है। कांग्रेस इसे 10 साल के कुशासन से मुक्ति की शुरुआत बता रही है। ऐसे में दोनों दलों के बीच जुबानी जंग और बयानबाज़िया तेज हो गई है।
उत्तराखंड में 2027 में विधानसभा चुनाव हैं, लेकिन सियासी बिसात अभी से बिछने लगी है। माना यह जाता है कि राज्य बनने के बाद एक बार भाजपा तो एक बार कांग्रेस की सरकार बनी रही, लेकिन पिछले 10 साल से भाजपा सत्ता पर काबिज है और इस बार केंद्र व राज्य सरकार की नीतियों व उपलब्धियों के दम पर 60 पार का लक्ष्य लेकर चल रही है। इस बीच टेस्ट मैच कहे जा रहे छात्रसंघ चुनाव और सेमीफाइनल माने जा रहे उधमसिंह नगर के किच्छा नगर पालिका चुनाव में विपक्ष ने प्रचंड जीत हासिल कर भाजपा को झटका देने के साथ विधानसभा सीटों के समीकरण बदलने के संकेत देने का काम भी किया हैं। जहाँ वार्ड नंबर 17 में कांग्रेस को 528 वोट मिले और भाजपा का प्रतिक्षि महज 53 वोर्ट पर ही सिमट गया साथ ही अन्य वार्डो की ऐसी स्थिति देख कांग्रेस उत्साहित है और 10 साल के कुशासन से मुक्ति की शुरुआत बता रही है। तो वहीं इन नतीजों ने भाजपा की चिंता बढ़ा दी है, जिसके चलते भाजपा चिंतन मंथन कर दावे करती नज़र आ रही है।
कुलमिलाकर, हाल ही के किच्छा और छात्रसंघ चुनाव के नतीजों ने साफ कर दिया है कि 2027 से पहले सियासी हवा बदलने लगी है। ये छोटे चुनाव भले ही स्थानीय मुद्दों पर लड़े गए हों, लेकिन इनसे निकला संदेश बड़ी बात कह रहा है। भाजपा के लिए जहां ये नतीजे आत्ममंथन का मौका हैं, वहीं 60 पार के नारे के बीच संगठन को बूथ स्तर पर और मजबूत करने की चुनौती भी है। तो दूसरी ओर विपक्ष के लिए ये जीत किसी लक्की ड्रा से कम नहीं है। कांग्रेस इसे बदलाव की आहट बता रही है और 10 साल के बाद सत्ता में वापसी का मौका देख रही है। ऐसे में अब देखना होगा कि क्या ये समीकरण 2027 के चुनावों में भी कायम रहता है या भाजपा वापसी करती है,लेकिन 2027 की तैयारियों को लेकर सभी छोटे बड़े दल अभी से अपनी जीत का दावा करते जरूर दिखाई दे रहे है.आगे इतना जरूर तय है कि आने वाले दिनों में बयानबाजी और सियासी घमासान और तेज होने वाला है।