वाटर ट्रीटमेंट प्लांट, पेड़ों का बलिदान !

उत्तराखंड डेस्क रिपोर्ट, हिमालयी राज्य उत्तराखंड में लगातार पर्यावरण को खतरा बढ़ता जा रहा है दअरसल एक ओर जहां राज्य में वनाग्नि से 1350 हेक्टेयर से ज्यादा जंगल जले। इसके अलावा आल वेदर रोड समेत तमाम राजमार्गों के निर्माण और चौड़ीकरण को लेकर अंधाधूंध पेड़ काटे जा रहे हैं। वहीं अब इस बीच देहरादून के नालापानी स्थित खलंगा में हजारों पेड़ों का कटान किया जाना है। इन पेड़ों को बचाने के लिए बड़ी संख्या में पर्यावरण प्रेमियों ने विरोध प्रदर्शन भी किया। पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने पेड़ों पर रक्षा सूत्र भी बांधे। आपको बता दें कि खलंगा वन क्षेत्र में सौंग परियोजना के वाटर ट्रीटमेंट प्लांट के निर्माण के लिए साल के पेड़ों को काटने की तैयारी है। इसके लिए पेड़ों पर निशान लगाकर नम्बर लिखे गए हैं। लेकिन अब इसका विरोध तेज हो गया है। वहीं कांग्रेस ने भी इस विरोध प्रदर्शन को अपना समर्थन दिया है। कांग्रेस ने सरकार पर पर्यावरण विरोधी होने का आरोप लगाया है। साथ ही एक भी पेड़ काटे जाने पर आंदोलन की चेतावनी दी है। वहीं वन विभाग का कहना है कि देहरादून की बढ़ती आबादी को पीने के पानी की उपलब्धता के लिए वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट पर कार्य किया जा रहा है। हांलाकि अभी खलंगा में वॉटर ट्रीटमेंट पर रिजर्व वायर के लिए योजना को फिलहाल सैद्धांतिक मंजूरी नहीं मिली है. सवाल ये है कि क्या विकास के नाम पर सरकार पर्यावरण की अंदेखी कर रही है। क्या ये अंदेखी भविष्य में उत्तराखंड को भारी पडेगी

 

देवभूमि उत्तराखंड की हरियाली पर लगातार खतरा मंडराते जा रहा है। दअरसल आए दिन प्रदेश में विकास के नाम पर पेड़ों का कटान किया जा रहा है। राजमार्गों के निर्माण और चौड़ीकरण के साथ ही तमाम कार्यों को लेकर हरे पेड़ों पर आरियां चलाई जा रही है। ऐसा ही वाटर ट्रीटमेंट प्लांट के नाम पर राजधानी देहरादून में देखने को मिल रहा है जहां खलंगा वन क्षेत्र में सौंग परियोजना के वाटर ट्रीटमेंट प्लांट के निर्माण के लिए साल के 2000 से ज्यादा पेड़ों को काटने की तैयारी है। इसके लिए पेड़ों पर निशान लगाकर नम्बर भी लिखे गए हैं। लेकिन अब इसका विरोध तेज हो गया है। इन पेड़ों को बचाने के लिए बड़ी संख्या में पर्यावरण प्रेमियों और स्थानीय लोगों ने इसका विरोध शुरू कर दिया है

आपको बता दें कि उत्तराखंड का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 53 हजार 483 किमी  है, जिसमें से 86% पहाड़ी है और 65 से 70 प्रतिशत जंगल से ढका हुआ है…इसमें से करीब 1350 हेक्टेयर से अधिक जंगल वनाग्नि से जल चुके हैं। इसके अलावा विकास के नाम पर हजारों पेड़ काटकर सड़क चौडीकरण और राजमार्गों का निर्माण किया जाता है। इतना ही नहीं अवैध पेड़ों का कटान भी बड़ी संख्या में प्रदेश में किया जाता है। जिससे पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचता है। वहीं इन सब चुनौतियों को देखते हुए वर्ष 2019 में तत्कालीन मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने मसूरी में हिमालयन कॉन्कलेव कराया था। इस कॉन्कलेव में 11 हिमालयी राज्यों ने प्रतिभाग किया था। वहीं खलंगा वन क्षेत्र में वाटर ट्रीटमेंट प्लांट के नाम पर कटने जा रहे हजारों पेड़ों पर सियासत गरमा गई है।

कुल मिलाकर हिमालय प्रदेश उत्तराखंड में विकास के नाम पर पर्यावरण को एक के बाद एक बड़ी चुनौतियों से सामना करना पड़ रहा है। उत्तराखंड में हजारों प्रोजेक्ट के नाम पर हरे पेड़ों पर आरियां चलाई जाती है। हांलाकि इस बात में भी कोई दोराय नहीं है कि प्रदेश का विकास होना चाहिए.. लेकिन विकास के नाम पर पर्यावरण की अंदेखी आखिर कितनी भारी पडेगी इसका आंकलन भी तो होना चाहिए

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