उत्तराखंड: फिर उठी आवाज, भू कानून और मूल निवास

उत्तराखंड- देवभूमि उत्तराखंड में लोकसभा चुनाव से पहले धामी सरकार की टेंशन तमाम राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों ने फिर बढ़ा दी है। दअरसल भू कानून और मूल निवास 1950 लागू करने की मांग को लेकर रविवार को हल्द्वानी में महारैली होने जा रही है। महारैली में 100 से ज्यादा सगठनों के जुड़ने की संभावना है। हल्द्वानी से पहले 24 दिसंबर को देहरादून में भी विशाल स्वाभिमान महारैली” हो चुकी है। जिसमें बड़ी संख्या में लोग पहुंचे। वहीं राज्य सरकार का कहना है कि वह मूल निवास और भू कानून को लेकर गंभीर है इसके लिए समिति गठित की गई है। इसके साथ ही सरकार ने सभी जिलाधिकारियों से पिछले दस साल में कृषि और बागवानी की जमीनों की बिक्री और लीज की अनुमति देने से जुड़े मामलों का रिकॉर्ड भी मांगा है। भू-कानून प्रारूप समिति की बैठक में अपर मुख्य सचिव राधा रतूड़ी ने सभी जिलाधिकारियों को यह जानकारी राजस्व विभाग को जल्द से जल्द भेजने के निर्देश दिए हैं। आपको बता दें कि उत्तराखंड में पिछले लंबे समय से भू- कानून और मूल निवास का मुद्दा गरमाता जा रहा है। सरकार की ओर से पूर्व मुख्य सचिव सुभाष कुमार की अध्यक्षता में भू कानून के लिए एक कमेटी भी गठित की गई थी। इस गठित भू कानून समिति ने सितंबर 2022 में धामी सरकार को अपनी सिफारिशें सौंप दी थी लेकिन शासन स्तर पर समिति की सिफारिशों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। वहीं उत्तराखंड में साल 2001 के बाद से मूल निवास प्रमाण पत्र की जगह पर स्थाई निवास प्रमाण पत्र बनना शुरू हुए थे। इसके बाद उत्तराखंड हाईकोर्ट की ओर से भी आदेश जारी हुए कि राज्य गठन के समय जो भी व्यक्ति उत्तराखंड में रहा, वो यहां का निवासी माना जाएगा। वहीं देश में मूल निवास प्रमाण पत्र साल 1950 से बनने शुरू हुए थे। बाद के वर्षों में सभी राज्यों में यही व्यवस्था दी गई कि 10 अगस्त, 1950 के समय जो व्यक्ति जिस राज्य में रहा, उसे वहीं का मूल निवासी माना गया। तमाम आंदोलनकारी सरकार से राज्य में इसी व्यवस्था को लागू करने की मांग की है। वहीं विपक्षी दलों का आरोप है कि सरकार यूसीसी के बहाने राज्य के असल मुद्दो से जनता का ध्यान भटकाने की कोशिश कर रही है

आपको बता दें कि उत्तराखंड में पिछले लंबे समय से सशक्त भू कानून और मूल निवास का मुद्दा गरमाता जा रहा है। सरकार की ओर से पूर्व मुख्य सचिव सुभाष कुमार की अध्यक्षता में भू कानून के लिए एक कमेटी भी गठित की गई थी। इस गठित भू कानून समिति ने सितंबर 2022 में धामी सरकार को अपनी सिफारिशें सौंप दी थीं लेकिन शासन स्तर पर समिति की सिफारिशों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। वहीं उत्तराखंड में समय समय पर भू कानून को लेकर संसोधन किए गए है। साल 2002 में नारायण दत्त तिवारी के नेतृत्व वाली पहली निर्वाचित सरकार ने भू कानून को कड़ा बनाने की पहल की। इसके तहत राज्य के बाहरी व्यक्तियों को आवासीय उपयोग के लिए 500 वर्ग मीटर भूमि की खरीद की अनुमति दी थी। इसके बाद वर्ष 2007 में तत्कालीन भुवन चंद्र खंडूड़ी सरकार ने भूमि खरीद की अनुमति 500 वर्ग मीटर से घटाकर 250 वर्ग मीटर की थी। जबकि वर्ष 2017 में तत्कालीन त्रिवेंद्र सरकार के कार्यकाल में भू कानून में फिर संशोधन हुए। तब पूंजी निवेश को आकर्षित करने के लिए औद्योगिक समेत विभिन्न उपयोग के लिए भूमि खरीद का दायरा 12.5 एकड़ से अधिक कर दिया गया। तब इसका राज्य में विरोध हुआ था और तभी से राज्य में हिमाचल के समान ही कड़ा भू कानून लागू करने की मांग की जा रही है।

कुल मिलाकर राज्य में सश्क्त भू कानून और मूल निवास का मुद्दा लगातार गरमाता जा रहा है। हांलाकि सरकार समिति गठित करने के साथ ही सभी जिलाधिकारियों से पिछले दस साल में कृषि और बागवानी की जमीनों की बिक्री और लीज की अनुमति देने से जुड़े मामलों का रिकॉर्ड भी मांग रही है। बावजूद इसके आंदोलनकारी पीछे हटने को राजी नहीं है। सवाल ये है कि क्या सरकार वाक्य में सश्कत भू कानून और मूल निवास 1950 लागू करने के लिए गंभीर है या फिर समिति गठित कर इन मुद्दों को दबाने की कोशिश की जा रही है।

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