“सिर्फ ब्रेकअप आत्महत्या के लिए उकसावा नहीं”…. दिल्ली हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

शिव शंकर सविता- दिल्ली हाईकोर्ट ने आत्महत्या से जुड़े एक संवेदनशील मामले में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया है कि केवल प्रेम संबंध का टूटना (ब्रेकअप) भारतीय दंड कानून के तहत आत्महत्या के लिए उकसाने (abetment to suicide) का अपराध नहीं माना जा सकता। जस्टिस मनोज जैन की एकल पीठ ने सुनवाई के दौरान आरोपी को जमानत प्रदान करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष अब तक ऐसे ठोस साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर पाया है, जो यह निर्णायक रूप से साबित कर सकें कि आरोपी ने आत्महत्या के लिए उकसाया।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला अक्टूबर 2025 में आत्महत्या करने वाली 27 वर्षीय एक स्कूल शिक्षिका की मौत से जुड़ा है। मृतका के पिता ने आरोप लगाया था कि आरोपी जो एक विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं ने उनकी बेटी पर धर्म परिवर्तन करने और उससे विवाह करने का दबाव डाला था। शिकायत में कहा गया कि इसी दबाव और बाद में संबंध टूटने की स्थिति के चलते युवती मानसिक तनाव में आ गई और उसने आत्महत्या जैसा कठोर कदम उठा लिया। जानकारी के अनुसार, दोनों की मुलाकात पढ़ाई के दौरान हुई थी और वे लगभग आठ वर्षों तक आपसी सहमति से संबंध में थे। हालांकि, दोनों परिवारों के विरोध के कारण फरवरी 2025 में उनका ब्रेकअप हो गया। इसके बाद आरोपी ने 19 अक्टूबर 2025 को किसी अन्य महिला से विवाह कर लिया। विवाह के पांच दिन बाद ही युवती ने आत्महत्या कर ली।

अधिवक्ता ने ये दी दलीलें

सुनवाई के दौरान आरोपी पक्ष ने तर्क दिया कि संबंध पूरी तरह से आपसी सहमति पर आधारित था और पूरे आठ वर्षों में किसी प्रकार की जबरदस्ती, उत्पीड़न या पुलिस शिकायत का कोई रिकॉर्ड नहीं है। वकील ने कहा कि ब्रेकअप पारिवारिक दबाव के कारण हुआ था और यह एक व्यक्तिगत निर्णय था। आरोपी की शादी के बाद युवती भावनात्मक रूप से आहत हुई हो सकती है, लेकिन इसे कानूनी रूप से ‘उकसावा’ नहीं माना जा सकता। अदालत ने भी इस बात पर गौर किया कि मामले में कोई सुसाइड नोट या ऐसा प्रत्यक्ष साक्ष्य नहीं मिला, जिससे यह संकेत मिले कि आरोपी ने आत्महत्या के लिए उकसाया हो। न्यायालय ने कहा कि भारतीय दंड संहिता के तहत उकसावे का अपराध सिद्ध करने के लिए यह आवश्यक है कि आरोपी का स्पष्ट इरादा हो और उसका आचरण ऐसा हो, जिससे पीड़ित के पास आत्महत्या के अलावा कोई विकल्प न बचे।

आरोपी प्रोफेसर को दी जमानत

जस्टिस मनोज जैन ने अपने आदेश में कहा कि वर्तमान साक्ष्य आत्महत्या के लिए उकसाने के आवश्यक तत्वों को स्थापित नहीं करते। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि भावनात्मक आघात या संबंध टूटने से उत्पन्न मानसिक तनाव को स्वतः आपराधिक उकसावे के दायरे में नहीं रखा जा सकता, जब तक कि स्पष्ट और प्रत्यक्ष प्रमाण मौजूद न हों। इन्हीं आधारों पर हाईकोर्ट ने आरोपी प्रोफेसर को जमानत दे दी।

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