बार-बार खांस रहा है बच्चा? सर्दी-जुकाम नहीं, प्रदूषण भी हो सकता है वजह, डॉक्टर से समझें खतरा

KNEWS DESK- उत्तर भारत में बढ़ते वायु प्रदूषण और स्मॉग का असर बच्चों की सेहत पर भी पड़ सकता है। लगातार खांसी, घरघराहट और सांस लेने में परेशानी को नजरअंदाज न करें। विशेषज्ञों के मुताबिक, प्रदूषण बच्चों के फेफड़ों और सांस की नलियों को प्रभावित कर सकता है।

दिल्ली-एनसीआर समेत उत्तर भारत के कई इलाकों में खराब वायु गुणवत्ता लोगों की चिंता बढ़ा रही है। प्रदूषित हवा के कारण बच्चों में बार-बार खांसी, गले में जलन और सांस लेने से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं। कई बार माता-पिता लगातार होने वाली खांसी को सामान्य सर्दी-जुकाम या संक्रमण समझ लेते हैं, जबकि इसकी वजह हवा में मौजूद प्रदूषण भी हो सकता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, प्रदूषित हवा में मौजूद बारीक कण सांस की नलियों में जलन और सूजन पैदा कर सकते हैं। इससे बलगम बढ़ने के साथ सांस की नलियां अधिक संवेदनशील हो जाती हैं। बच्चों को इसका खतरा ज्यादा हो सकता है, क्योंकि उनके फेफड़े अभी विकसित हो रहे होते हैं और शरीर के वजन के अनुपात में वे वयस्कों की तुलना में अधिक हवा अंदर लेते हैं। हवा में मौजूद पीएम 2.5 जैसे सूक्ष्म प्रदूषण कण बच्चों में पहले से मौजूद अस्थमा और एलर्जी की समस्या को बढ़ा सकते हैं। इसके कारण सूखी खांसी, घरघराहट और सांस फूलने जैसी परेशानियां हो सकती हैं। कई बार वायरल संक्रमण ठीक होने के बाद भी खांसी लंबे समय तक बनी रहती है। प्रदूषण सांस से जुड़े संक्रमणों के खतरे और लक्षणों को भी प्रभावित कर सकता है। ऐसे में हर बार खांसी को केवल संक्रमण मानकर इलाज करना सही नहीं है।

कब डॉक्टर को दिखाना जरूरी है?

डॉ. निखिल राजवंशी, कंसल्टेंट पीडियाट्रिक पल्मोनोलॉजिस्ट, एलर्जी और स्लीप स्पेशलिस्ट, रेनबो चिल्ड्रन हॉस्पिटल, दिल्ली के मुताबिक, अगर बच्चे को बार-बार या लगातार खांसी हो रही है, खांसते समय घरघराहट होती है, रात में खांसी के कारण नींद टूटती है या बच्चा पहले की तरह खेल-कूद नहीं कर पा रहा है, तो डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए। बच्चों में चार सप्ताह से अधिक समय तक खांसी बने रहने पर इसकी जांच कराना जरूरी है। अगर बच्चे को सांस लेने में गंभीर परेशानी हो रही है, वह बोलने या पीने में असमर्थ है या उसके होंठ नीले पड़ रहे हैं, तो तुरंत आपातकालीन चिकित्सा सहायता लें। ऐसे लक्षणों को सामान्य खांसी समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।

प्रदूषण बच्चों के फेफड़ों को कैसे प्रभावित करता है?

डॉ. विकास मित्तल, डायरेक्टर और पल्मोनोलॉजिस्ट, सी.के. बिरला हॉस्पिटल के अनुसार, स्मॉग के दौरान होने वाली लगातार खांसी की वजह प्रदूषण हो सकता है, लेकिन बार-बार होने वाले सांस के संक्रमण भी इसके लिए जिम्मेदार हो सकते हैं। पीएम 2.5 जैसे बारीक कण सांस की नलियों में सूजन और जलन पैदा करते हैं। इससे गले में खराश, सूखी खांसी, घरघराहट और सांस फूलने जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

जिन बच्चों को पहले से अस्थमा या सांस से जुड़ी कोई बीमारी है, उनमें प्रदूषण का असर ज्यादा गंभीर हो सकता है। इसके अलावा, प्रदूषित हवा सांस के तंत्र की प्राकृतिक सुरक्षा को प्रभावित कर सकती है, जिससे संक्रमण से बचाव करना मुश्किल हो सकता है। खांसी के लक्षणों से ही हमेशा यह पता लगाना संभव नहीं होता कि समस्या प्रदूषण के कारण है या संक्रमण की वजह से। अगर खांसी रात में बढ़ती है या उसके साथ घरघराहट होती है, तो सांस की नलियों की संवेदनशीलता इसकी एक वजह हो सकती है। वहीं, बुखार, बदन दर्द और कमजोरी संक्रमण की आशंका की ओर संकेत कर सकते हैं। हालांकि, सही कारण की पुष्टि के लिए डॉक्टर की जांच जरूरी है।

बच्चों को प्रदूषण से बचाने के लिए क्या करें?

प्रदूषण के बढ़ते स्तर के दौरान बच्चों की सेहत का विशेष ध्यान रखना चाहिए। इसके लिए कुछ सावधानियां अपनाई जा सकती हैं।

  • अपने इलाके का एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) नियमित रूप से जांचें।
  • हवा की गुणवत्ता खराब होने पर बच्चों को लंबे समय तक बाहर खेलने से बचाएं।
  • प्रदूषण अधिक होने पर बाहर तेज शारीरिक गतिविधियां और एक्सरसाइज करने से बचें।
  • घर के अंदर सिगरेट के धुएं, अगरबत्ती के धुएं और अन्य प्रदूषण फैलाने वाले स्रोतों को कम करें।
  • घर की हवा को साफ रखने के लिए परिस्थितियों के अनुसार उचित एयर फिल्टर का इस्तेमाल किया जा सकता है।
  • अगर बच्चे को अस्थमा है, तो डॉक्टर की सलाह के अनुसार उसकी दवाएं नियमित रूप से दें।
  • बिना डॉक्टर की सलाह के बार-बार एंटीबायोटिक या दूसरी दवाएं देने से बचें।

बच्चों में बार-बार होने वाली खांसी को केवल बदलते मौसम या संक्रमण से जोड़कर देखना सही नहीं है। वायु प्रदूषण भी इसकी वजह हो सकता है। इसलिए लक्षण लंबे समय तक बने रहने, बार-बार लौटने या सांस से जुड़ी परेशानी होने पर डॉक्टर से जांच कराना जरूरी है। समय पर सही कारण का पता चलने से बच्चे को उचित इलाज और जरूरी देखभाल मिल सकती है।

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