Knews Desk- इजराइल में आज होने वाला मतदान प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के राजनीतिक भविष्य के लिहाज से अहम माना जा रहा है। इस चुनाव में 120 सीटों के लिए करीब 73 लाख मतदाता अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे। इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने नेतन्याहू की तारीफ करते हुए कहा कि उन्होंने मुश्किल हालात में प्रधानमंत्री के तौर पर अच्छा काम किया है। हालांकि, मतदान से ठीक पहले ईरान पर संभावित सैन्य कार्रवाई को लेकर सामने आई रिपोर्ट्स ने नेतन्याहू की रणनीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं।इजराइली चैनल 12 की रिपोर्ट के मुताबिक, नेतन्याहू ने मतदान से दो दिन पहले सेना प्रमुख इयाल जामिर को ईरान के खिलाफ एक गुप्त सैन्य कार्रवाई करने के निर्देश दिए थे। हालांकि, जामिर ने तत्काल कार्रवाई करने से इनकार कर दिया। रिपोर्ट्स के अनुसार, उन्होंने इस मुद्दे पर जल्दबाजी के बजाय विस्तृत रणनीतिक चर्चा की जरूरत बताई। इसके बाद नेतन्याहू और उनके प्रशासन ने सेना प्रमुख से इनकार की वजह जाननी चाही।
जामिर का मानना बताया जा रहा है कि इजराइल के पिछले हमलों ने ईरान की परमाणु और मिसाइल क्षमताओं को काफी नुकसान पहुंचाया है। ऐसे में फिलहाल ईरान से तत्काल खतरा नहीं है। उनके मुताबिक, इजराइल को दो परिस्थितियों में ही तुरंत हमला करने पर विचार करना चाहिए। पहली, जब ईरान खुद इजराइल पर हमला करने वाला हो। दूसरी, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप नया युद्ध शुरू करें और इजराइल को अमेरिका का पूरा समर्थन हासिल हो।रिपोर्ट के अनुसार, नेतन्याहू की ओर से सैन्य कार्रवाई के लिए दबाव बनाए जाने के बावजूद जामिर ने औपचारिक लिखित मंजूरी मांगी। इसके बाद कथित तौर पर नेतन्याहू या उनके करीबियों की ओर से कोई जवाब नहीं दिया गया। इस घटनाक्रम ने इजराइल में यह बहस तेज कर दी है कि क्या ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई का विचार राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा था या इसके पीछे चुनावी लाभ हासिल करने की मंशा भी थी।
नेतन्याहू की सरकार पर आरोप लग रहे हैं कि वह चुनाव में बढ़त बनाने के लिए ईरान के मुद्दे का राजनीतिक इस्तेमाल कर सकती है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने भी मतदान से 48 घंटे पहले सोशल मीडिया पर नेतन्याहू के समर्थन में पोस्ट किया था। उन्होंने ऑपरेशन मिडनाइट हैमर और ऑपरेशन एपिक फ्यूरी का जिक्र करते हुए दावा किया कि इन कार्रवाइयों ने ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं और सैन्य क्षमता को कमजोर किया। उन्होंने मतदाताओं से मतदान करते समय इन घटनाओं को याद रखने की अपील भी की।IDF प्रमुख के इनकार के पीछे कई संभावित कारण बताए जा रहे हैं। ईरान पर हमला होने की स्थिति में जवाबी कार्रवाई और उसके सहयोगी संगठनों के हमलों से क्षेत्रीय संघर्ष बढ़ सकता है। इससे इजराइल की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचने की आशंका है। इसके अलावा, यदि सैन्य कार्रवाई को आत्मरक्षा के बजाय राजनीतिक हितों से प्रेरित माना गया, तो इजराइल को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कूटनीतिक समर्थन खोने का खतरा हो सकता है। गाजा और लेबनान मोर्चों पर लंबे समय से जारी संघर्ष के कारण सैनिकों की थकान और गोला-बारूद की कमी भी चिंता का विषय हो सकती है।
इजराइल में प्रधानमंत्री और सेना प्रमुख के बीच सैन्य रणनीति को लेकर मतभेद पहले भी सामने आते रहे हैं। वर्ष 1967 में प्रधानमंत्री लेवी एशकोल और सेना प्रमुख यित्ज़ाक राबिन के बीच हमले के समय को लेकर मतभेद थे। 1973 के योम किप्पूर युद्ध से पहले रिजर्व सैनिकों को बुलाने के मुद्दे पर भी असहमति रही। वर्ष 1993 में प्रधानमंत्री यित्ज़ाक राबिन और सेना प्रमुख एहुद बराक के बीच फिलीस्तीनी मुक्ति संगठन के साथ शांति समझौते को लेकर मतभेद सामने आए थे।हालांकि, मौजूदा मामले में मुख्य सवाल नेतन्याहू पर लगे उस आरोप का है, जिसमें ईरान के खिलाफ युद्ध को चुनावी फायदे से जोड़कर देखा जा रहा है। सेना प्रमुख का इनकार रणनीतिक और सैन्य चिंताओं से जुड़ा बताया जा रहा है, लेकिन इस घटनाक्रम का चुनाव पर क्या असर पड़ेगा, यह मतदान के नतीजों के बाद ही स्पष्ट होगा।