‘दम मारो दम’ का विवाद: बैन से लेकर अवॉर्ड तक, कैसे बना आइकॉनिक गाना

KNEWS DESK: भारतीय सिनेमा और संगीत के इतिहास में कई ऐसे गीत रहे हैं, जिन्होंने केवल मनोरंजन ही नहीं किया बल्कि समाज में गहरी बहस भी छेड़ी। इन्हीं में से एक है आशा भोसले की मधुर आवाज में गाया गया चर्चित गीत ‘दम मारो दम’, जो वर्ष 1971 में प्रदर्शित फिल्म हरे रामा हरे कृष्णा का हिस्सा था। यह गीत उस दौर में सामने आया जब देश की युवा पीढ़ी तेजी से बदलाव के दौर से गुजर रही थी और पश्चिमी संस्कृति का प्रभाव समाज में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता था। ऐसे समय में इस गीत ने न केवल लोकप्रियता हासिल की, बल्कि सामाजिक विवादों को भी जन्म दिया।

इस गीत की विशेषता केवल इसकी धुन या शब्दों में नहीं थी, बल्कि इसकी प्रस्तुति भी अपने समय से काफी अलग और साहसिक थी। इस गीत को प्रसिद्ध संगीतकार राहुल देव बर्मन ने स्वरबद्ध किया था और इसके बोल जाने-माने गीतकार आनंद बख्शी ने लिखे थे। पर्दे पर इसे जीनत अमान और देव आनंद पर फिल्माया गया, जिसमें जीनत अमान का हिप्पी अंदाज और नशे से जुड़े दृश्य दिखाए गए। यह सब उस समय के पारंपरिक भारतीय समाज के लिए नया और चौंकाने वाला था।

गीत के प्रसारित होते ही समाज के एक वर्ग ने इसका तीव्र विरोध शुरू कर दिया। आलोचकों का मानना था कि ‘दम मारो दम’ जैसे गीत युवाओं को नशे की ओर प्रेरित कर सकते हैं और समाज में गलत संदेश फैला सकते हैं। उस समय सिनेमा को समाज का दर्पण माना जाता था, इसलिए इस प्रकार के दृश्यों और गीतों को लेकर लोगों की संवेदनशीलता और भी अधिक थी। कई सामाजिक संगठनों और जागरूक नागरिकों ने इस गीत के खिलाफ आवाज उठाई और इसे भारतीय संस्कृति के विरुद्ध बताया।

विवाद बढ़ने के साथ ही यह मामला सरकारी स्तर तक पहुंच गया। देश के प्रमुख सरकारी प्रसारण माध्यम दूरदर्शन से इस गीत को हटा दिया गया और कई रेडियो केंद्रों ने भी इसे प्रसारित करने पर रोक लगा दी। यह कदम उस समय के संदर्भ में काफी बड़ा माना गया, क्योंकि किसी लोकप्रिय गीत पर इस तरह का प्रतिबंध उसकी गंभीरता को दर्शाता था। हालांकि, इन प्रतिबंधों का असर आम जनता के बीच इसकी लोकप्रियता पर बहुत ज्यादा नहीं पड़ा।

जहां एक ओर विरोध और प्रतिबंध जारी थे, वहीं दूसरी ओर युवा पीढ़ी इस गीत को बेहद पसंद कर रही थी। इसकी धुन, आवाज और अलग अंदाज ने इसे लोगों के दिलों में खास जगह दिला दी। धीरे-धीरे यह गीत एक चलन बन गया और विभिन्न समारोहों तथा आयोजनों में बजने लगा। यह स्थिति इस बात का प्रमाण थी कि लोगों के बीच इसकी लोकप्रियता किसी भी विवाद से कहीं अधिक मजबूत थी।

अंततः समय ने यह साबित कर दिया कि सच्ची कला हर विरोध और आलोचना से ऊपर होती है। जिस गीत को एक समय दूरदर्शन और रेडियो से हटा दिया गया था, उसी ने आशा भोसले को सर्वश्रेष्ठ महिला पार्श्व गायिका का सम्मान दिलाया। आज ‘दम मारो दम’ हिंदी सिनेमा के सबसे प्रसिद्ध और अमर गीतों में गिना जाता है, जो यह दर्शाता है कि एक प्रभावशाली रचना समय के साथ अपनी अलग पहचान जरूर बना लेती है।

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