दिल्ली में वोटर लिस्ट के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से मतदाताओं की परेशानियां दूर करने और नाम शामिल कराने की प्रक्रिया आसान बनाने को कहा है। अदालत ने सवाल उठाया कि पहले से वोटर लिस्ट में दर्ज लोगों का पता बदलने पर उन्हें नए मतदाता की तरह फॉर्म-6 भरने के लिए क्यों कहा जा रहा है। चुनाव आयोग ने सुनवाई के दौरान ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से जुड़ी आपत्तियां और दावे दाखिल करने की 30 अक्टूबर की समयसीमा बढ़ाने का भरोसा दिया है।
Knews Desk – सुप्रीम कोर्ट में बुधवार, 28 अक्टूबर को हुई सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने चुनाव आयोग से पूछा कि जिन लोगों के नाम 2026 की मतदाता सूची में पहले से दर्ज थे और बाद में उन्होंने अपना पता बदल लिया, उन्हें नए मतदाता के तौर पर फॉर्म-6 भरने की जरूरत क्यों पड़ रही है। अदालत ने कहा कि पता बदलने वाले मतदाताओं के लिए फॉर्म-8 का इस्तेमाल किया जा सकता है। फॉर्म-6 नए मतदाता के पंजीकरण के लिए और फॉर्म-8 पते में बदलाव जैसी जानकारियों को अपडेट करने के लिए निर्धारित है।
अदालत ने निर्देश दिया कि जिन मतदाताओं ने अब तक एन्यूमरेशन फॉर्म जमा नहीं किया है या जिनका पता बदल गया है, उन्हें अपनी प्रक्रिया पूरी करने का अवसर मिलना चाहिए। सुनवाई के दौरान यह चिंता भी जताई गई कि बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) के घर आने के समय यदि कोई व्यक्ति मौजूद नहीं था, तो केवल फॉर्म जमा नहीं कर पाने के कारण उसे मतदाता सूची से बाहर नहीं रखा जाना चाहिए। अदालत ने चुनाव आयोग से ऐसे मामलों के समाधान के लिए उचित व्यवस्था तैयार करने को कहा।
दिल्ली की ड्राफ्ट वोटर लिस्ट 31 अगस्त को प्रकाशित हुई थी। इसमें करीब 1.45 करोड़ पंजीकृत मतदाताओं में से 47.57 लाख लोगों के नाम शामिल नहीं थे। इन लोगों को अनुपस्थित, स्थानांतरित, मृत या डुप्लीकेट श्रेणियों में रखा गया था। दावे और आपत्तियां दर्ज कराने की अंतिम तारीख पहले 30 सितंबर थी, जिसे बाद में बढ़ाकर 30 अक्टूबर किया गया। अब सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग ने इस समयसीमा को और बढ़ाने का भरोसा दिया है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने अदालत को बताया कि बड़ी संख्या में मतदाताओं को एन्यूमरेशन फॉर्म नहीं मिल पाए थे या वे निर्धारित समय में उसे जमा नहीं कर सके। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि जिन लोगों का पता बदला है, उन्हें फॉर्म-8 के बजाय फॉर्म-6 भरने के लिए क्यों कहा जा रहा है। चुनाव आयोग की ओर से पेश अधिवक्ता डीएस नायडू ने कहा कि मतदाता निर्धारित प्रक्रिया के तहत अपने नाम शामिल कराने के लिए आवेदन कर सकते हैं और आयोग ने जागरूकता अभियान भी चलाए हैं।
सुनवाई के दौरान अदालत ने सुझाव दिया कि ड्राफ्ट वोटर लिस्ट से बाहर हुए लोगों की सूची स्थानीय कार्यालयों और मतदान केंद्रों पर प्रकाशित की जाए। सूची में उनके पुराने पते और मतदाता सूची से जुड़ी जानकारी भी दी जा सकती है, ताकि लोग अपनी स्थिति की पहचान कर सकें और संबंधित अधिकारियों से संपर्क कर सकें।
सुप्रीम कोर्ट ने वोटर लिस्ट में दर्ज नामों को ‘लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी’ यानी तार्किक विसंगति की श्रेणी में रखने के तरीके पर भी सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि वह इस बात की जांच करेगी कि ऐसे मामलों में अधिकारियों ने उचित स्तर पर विचार किया था या नहीं। याचिकाकर्ता पक्ष ने सुनवाई के दौरान करीब 13 लाख मतदाताओं के अनमैप्ड होने और लगभग 19 लाख मामलों में तार्किक विसंगतियां दर्ज होने का मुद्दा उठाया। अदालत ने संकेत दिया कि इस श्रेणी की कानूनी वैधता पर विस्तार से सुनवाई की जाएगी।
दिल्ली SIR मामले में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई का मुख्य जोर यह सुनिश्चित करने पर रहा कि पात्र मतदाता केवल प्रक्रियागत कठिनाइयों के कारण मतदाता सूची से बाहर न रह जाएं। अदालत ने चुनाव आयोग से प्रभावित लोगों के लिए प्रक्रिया को सुगम बनाने और उनके दावों पर उचित तरीके से विचार करने को कहा है।