डिजिटल डेस्क- सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला केस से जुड़े रेफरेंस मामलों की सुनवाई के आठवें दिन अहम बहस और तीखी टिप्पणियां सामने आईं। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना ने स्पष्ट कहा कि “व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी” से प्राप्त जानकारी को न्यायिक प्रक्रिया में स्वीकार नहीं किया जा सकता। उनकी यह टिप्पणी उस समय आई जब वरिष्ठ अधिवक्ता नीरज किशन कौल ने तर्क दिया कि ज्ञान और बुद्धिमत्ता को उसके स्रोत की परवाह किए बिना स्वीकार किया जाना चाहिए। दरअसल, बहस के दौरान कौल ने शशि थरूर के एक लेख का हवाला दिया, जिसमें धार्मिक मामलों में न्यायिक संयम बरतने की बात कही गई थी। इस पर मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि अदालत सभी प्रख्यात लेखकों और विचारकों का सम्मान करती है, लेकिन किसी लेख में व्यक्त विचार अंततः व्यक्तिगत राय होते हैं और उनका न्यायालय पर कोई बाध्यकारी प्रभाव नहीं होता।
ज्ञान किसी भी स्रोत से आए, उसे स्वीकार करना चाहिए- अधिवक्ता नीरज किशन कौल
कौल ने अपने पक्ष में कहा कि ज्ञान किसी भी स्रोत से आए, उसे स्वीकार करना चाहिए। उन्होंने यह भी जोड़ा कि भारतीय सभ्यता इतनी समृद्ध है कि वह दुनिया के किसी भी हिस्से से आने वाले ज्ञान को अपनाने में सक्षम है। हालांकि, इस तर्क पर जस्टिस नागरत्ना ने स्पष्ट करते हुए कहा कि “लेकिन व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी से नहीं,” और इस तरह गैर-प्रमाणिक स्रोतों को लेकर न्यायालय की सख्त स्थिति जाहिर की। सुनवाई के दौरान धार्मिक अधिकारों और सामाजिक सुधार कानूनों के बीच संतुलन का मुद्दा भी प्रमुखता से उठा। कौल, दाऊदी बोहरा समुदाय के मुखिया की ओर से बहिष्कार की प्रथा को चुनौती देने वाली याचिका में पेश हो रहे हैं। उन्होंने तर्क दिया कि संविधान के अनुच्छेद 26(ख) के तहत धार्मिक संप्रदायों को मिले अधिकारों को हर स्थिति में अनुच्छेद 25(2)(ख) के तहत बनाए गए सामाजिक सुधार कानूनों के अधीन नहीं माना जा सकता।
अधिकार स्वयं “सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य” के अधीन हैं- न्यायमूर्ति नागरत्ना
इस पर न्यायमूर्ति नागरत्ना ने अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि जब अनुच्छेद 25(2)(ख) के तहत कोई कानून बनाया जाता है, तो यह नहीं कहा जा सकता कि किसी धार्मिक संप्रदाय का अधिकार हमेशा सर्वोपरि रहेगा। उन्होंने कहा कि ये अधिकार स्वयं “सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य” के अधीन हैं और इन्हीं आधारों पर सामाजिक सुधार या कल्याण से जुड़े कानून बनाए जा सकते हैं। इस टिप्पणी से साफ संकेत मिलता है कि सुप्रीम कोर्ट धार्मिक स्वतंत्रता और सामाजिक सुधार के बीच संतुलन को लेकर गंभीरता से विचार कर रहा है। अदालत यह सुनिश्चित करना चाहती है कि संविधान में दिए गए अधिकारों का इस्तेमाल समाज के व्यापक हितों के खिलाफ न हो।