दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर के निधन का कारण कार्डियक अरेस्ट बताया जा रहा है। ऐसे में लोगों के मन में अक्सर यह सवाल उठता है कि हार्ट अटैक और कार्डियक अरेस्ट में क्या अंतर होता है। दोनों को एक ही समझना सही नहीं है, क्योंकि ये अलग-अलग स्थितियां हैं।
दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर के निधन का कारण कार्डियक अरेस्ट बताया जा रहा है। रिपोर्टों के मुताबिक, 75 वर्षीय अभिनेता को घर पर कार्डियक अरेस्ट आया और उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने सीपीआर देकर उन्हें बचाने की कोशिश की, लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका।
कार्डियक अरेस्ट में दिल अचानक शरीर में खून पंप करना बंद कर देता है। इसके कारण दिमाग और शरीर के दूसरे जरूरी अंगों तक ऑक्सीजन पहुंचना रुक जाती है। अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन के मुताबिक, कार्डियक अरेस्ट की स्थिति में व्यक्ति अचानक बेहोश हो सकता है और सामान्य तरीके से सांस लेना बंद कर सकता है।
वहीं हार्ट अटैक तब होता है जब दिल की किसी नस में ब्लॉकेज हो जाती है और हृदय की मांसपेशियों तक खून और ऑक्सीजन की सप्लाई कम या बंद हो जाती है। मेदांता मूलचंद हॉस्पिटल के कार्डियोलॉजी विभाग के प्रोफेसर डॉ. तरुण कुमार के मुताबिक, हार्ट अटैक के दौरान दिल आमतौर पर धड़कता रहता है। इसके विपरीत कार्डियक अरेस्ट मुख्य रूप से दिल की इलेक्ट्रिकल सिस्टम में गड़बड़ी के कारण हो सकता है। इससे दिल की धड़कन इतनी अनियमित हो सकती है कि वह प्रभावी तरीके से खून पंप नहीं कर पाता या पूरी तरह रुक जाता है। हार्ट अटैक कभी-कभी कार्डियक अरेस्ट को भी ट्रिगर कर सकता है।
कार्डियक अरेस्ट कई बार बिना किसी स्पष्ट चेतावनी के अचानक हो सकता है। व्यक्ति बात करते-करते या सामान्य काम करते हुए अचानक गिर सकता है, बेहोश हो सकता है और सामान्य सांस लेना बंद कर सकता है। हालांकि कुछ लोगों में पहले सीने में दर्द, सांस फूलना, असामान्य थकान, चक्कर, बेहोशी या दिल की धड़कन तेज या अनियमित होने जैसे संकेत दिखाई दे सकते हैं।
कार्डियक अरेस्ट की स्थिति में हर सेकंड बेहद महत्वपूर्ण होता है। अगर कोई व्यक्ति अचानक गिर जाए, आवाज देने या हिलाने पर प्रतिक्रिया न दे और सामान्य सांस न ले रहा हो या सिर्फ हांफ रहा हो, तो तुरंत इमरजेंसी मदद बुलानी चाहिए। ऐसी स्थिति में सीपीआर शुरू करना और उपलब्ध होने पर एईडी यानी ऑटोमेटेड एक्सटर्नल डिफिब्रिलेटर का इस्तेमाल करना जान बचाने में मदद कर सकता है।
सीपीआर का मकसद मेडिकल मदद या डिफिब्रिलेशन उपलब्ध होने तक शरीर और दिमाग में कुछ हद तक खून का प्रवाह बनाए रखना होता है। इसलिए कार्डियक अरेस्ट में शुरुआती मिनट बेहद अहम होते हैं और मदद मिलने में देरी जानलेवा हो सकती है।