बिहार में बीजेपी को लगातार दो चुनावों में झटका लगा है। पहले बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव और अब पटना शिक्षक एमएलसी चुनाव में पार्टी को हार का सामना करना पड़ा। शहरी इलाकों में मजबूत पकड़ रखने वाली बीजेपी के सामने अब अपने पारंपरिक वोट बैंक और उम्मीदवारों के चयन को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं।
Knews Desk– बिहार में विधान परिषद की आठ सीटों के चुनाव परिणाम सामने आने के बाद पटना शिक्षक क्षेत्र की हार ने राजनीतिक हलकों में सबका ध्यान खींचा है। यहां भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के नवल किशोर यादव को राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के संजीव कुमार ने हराया। नवल किशोर यादव पिछले करीब 30 वर्षों से इस सीट पर लगातार जीत दर्ज करते आ रहे थे। पटना को बीजेपी का मजबूत गढ़ माना जाता है, ऐसे में इस सीट पर पार्टी की हार को अहम राजनीतिक झटके के तौर पर देखा जा रहा है।पिछले दो महीनों में यह दूसरा मौका है, जब बीजेपी को अपने मजबूत माने जाने वाले क्षेत्र में हार का सामना करना पड़ा है। अगस्त 2026 में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की विधानसभा सीट बांकीपुर में उपचुनाव के दौरान जनसुराज के प्रशांत किशोर ने जीत हासिल की थी। इसके बाद अब पटना शिक्षक एमएलसी चुनाव में पार्टी को हार मिली है। लगातार दो चुनावों में मिले इन झटकों ने बिहार में बीजेपी की शहरी क्षेत्रों में पकड़ को लेकर चर्चा तेज कर दी है।
नवल किशोर यादव के राजनीतिक सफर की शुरुआत राष्ट्रीय जनता दल से हुई थी। वे पहली बार आरजेडी के टिकट पर ही विधान परिषद के सदस्य चुने गए थे। बाद में लालू प्रसाद यादव से मतभेद के बाद वे बीजेपी में शामिल हो गए। इसके बाद से इस सीट पर बीजेपी का दबदबा बना रहा। इस बार भी पार्टी ने नवल किशोर यादव पर भरोसा जताया, लेकिन चुनावी समीकरण बदलने के बीच उन्हें हार का सामना करना पड़ा।इस चुनाव में संजीव कुमार ने नवल किशोर यादव को 1,058 वोटों से हराया। जनसुराज के उम्मीदवार को भी 1,500 से अधिक वोट मिले। चुनाव में प्रशांत किशोर की पार्टी को मिले वोटों को बीजेपी के पारंपरिक मतदाताओं में सेंध के तौर पर देखा जा रहा है। जनसुराज की मौजूदगी ने मुकाबले को प्रभावित किया और बीजेपी के लिए चुनौती बढ़ाई।
जातीय समीकरण भी इस चुनाव में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। संजीव कुमार भूमिहार समुदाय से आते हैं, जबकि नवल किशोर यादव यादव जाति से ताल्लुक रखते हैं। बिहार की राजनीति में जातीय समीकरणों की अहम भूमिका रही है। ऐसे में भूमिहार समुदाय के समर्थन और अन्य सामाजिक समूहों के वोटों का बंटवारा चुनावी नतीजे को प्रभावित करने वाले कारकों में शामिल माना जा रहा है।नवल किशोर यादव के खिलाफ एंटी-इनकंबेंसी भी हार की एक वजह बताई जा रही है। शिक्षक समुदाय के बीच सातवें वेतनमान का मुद्दा चर्चा में था। इस मुद्दे पर बीजेपी सरकार को लेकर असंतोष की बात सामने आई। इसके अलावा उम्मीदवार के चयन को लेकर भी सवाल उठे। नवल किशोर यादव के खिलाफ शिक्षक वर्ग में पहले से विरोध की चर्चा थी, लेकिन पार्टी ने उन्हें ही उम्मीदवार बनाया।
बांकीपुर और पटना शिक्षक क्षेत्र में मिली हार के बाद बीजेपी के सामने अपने पारंपरिक समर्थकों को साथ बनाए रखने की चुनौती भी है। बिहार में शहरी सीटों को लंबे समय से बीजेपी का मजबूत आधार माना जाता रहा है। लेकिन हाल के चुनावी नतीजों ने इस धारणा पर सवाल खड़े किए हैं। सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद सवर्ण समुदाय के कुछ वर्गों में नाराजगी की चर्चा भी सामने आई है। प्रशांत किशोर लगातार इस वर्ग को अपने साथ जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं और पटना शिक्षक चुनाव में जनसुराज को मिले 1,500 से अधिक वोटों को इसी राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के संदर्भ में देखा जा रहा है।उम्मीदवार चयन के अलावा राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के सहयोगी दलों के बीच वोटों का पूरी तरह एक-दूसरे के पक्ष में स्थानांतरित नहीं होना भी चुनावी परिणामों की एक वजह माना जा रहा है। तिरहुत शिक्षक सीट पर बीजेपी को जीत मिली, लेकिन तिरहुत स्नातक सीट पर जेडीयू उम्मीदवार हार गए। इसी तरह दरभंगा में बीजेपी ने स्नातक सीट जीती, जबकि शिक्षक सीट पर जेडीयू को हार का सामना करना पड़ा। पटना में भी बीजेपी की हार के बीच उसकी सहयोगी जेडीयू ने स्नातक सीट पर जीत हासिल की।
इन नतीजों से संकेत मिलता है कि एनडीए के सहयोगी दलों के बीच चुनावी समर्थन हर सीट पर एक जैसा नहीं रहा। हालांकि, दो चुनावों के परिणामों के आधार पर पूरे बिहार में बीजेपी की स्थिति का अंतिम निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी, लेकिन बांकीपुर और पटना शिक्षक क्षेत्र में मिली हार ने पार्टी के लिए अपने वोट बैंक, उम्मीदवार चयन और गठबंधन के तालमेल की समीक्षा का सवाल जरूर खड़ा कर दिया है।