संरक्षित इमारतें पूजा स्थल कानून के दायरे से बाहर, भोजशाला मामले में ASI के रुख पर बढ़ी चर्चा

KNEWS DESK – पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम-1991 को लेकर देश में एक बार फिर बहस तेज हो गई है। हाल ही में सामने आई कानूनी चर्चाओं और मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में चल रहे भोजशाला मामले ने इस कानून की व्याख्या और इसके दायरे को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।

कानून के अनुसार, यह स्पष्ट प्रावधान है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (Archaeological Survey of India) द्वारा संरक्षित प्राचीन और ऐतिहासिक स्मारक इस अधिनियम के दायरे से बाहर हैं। यानी ऐसे स्मारकों पर यह कानून सीधे लागू नहीं होता, जो पहले से ही प्राचीन स्मारक एवं पुरातात्विक स्थल अधिनियम, 1958 के तहत संरक्षित हैं।

अधिनियम की धारा 3 और 4 के अनुसार, किसी भी पूजा स्थल के धार्मिक स्वरूप को 15 अगस्त 1947 की स्थिति से बदला नहीं जा सकता। इसका उद्देश्य देश में धार्मिक स्थलों की स्थिति को यथास्थिति में बनाए रखना है। हालांकि धारा 5 के तहत कुछ महत्वपूर्ण अपवाद भी दिए गए हैं।

इन अपवादों में प्राचीन स्मारक, अदालतों द्वारा पहले से निपटाए गए मामले और वे विवाद शामिल हैं, जो कानून लागू होने से पहले आपसी सहमति से सुलझा लिए गए थे। खास बात यह है कि अयोध्या विवाद को भी इस अधिनियम के विशेष प्रावधानों के तहत अलग श्रेणी में रखा गया था।

इसी बीच मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में भोजशाला परिसर (जिसे हिंदू पक्ष वाग्देवी मंदिर और मुस्लिम पक्ष कमाल मौला मस्जिद मानता है) को लेकर सुनवाई चल रही है। यह मामला एक बार फिर चर्चा में है क्योंकि दोनों पक्ष इसके धार्मिक स्वरूप को लेकर अलग-अलग दावे कर रहे हैं।

हिंदू पक्ष का तर्क है कि यह 11वीं सदी का मंदिर है और Archaeological Survey of India की मौजूदा व्यवस्था से उनके धार्मिक अधिकार प्रभावित हो रहे हैं। वहीं मुस्लिम पक्ष का कहना है कि यह स्थान 15 अगस्त 1947 को मस्जिद के रूप में मौजूद था, इसलिए इसका स्वरूप बदला नहीं जा सकता।

वर्तमान में यह मामला सुप्रीम कोर्ट में भी विचाराधीन है, जहां पूजा स्थल अधिनियम की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह कानून न्यायिक उपचार के अधिकार को सीमित करता है, जबकि समर्थकों का मानना है कि यह देश में धार्मिक शांति और यथास्थिति बनाए रखने के लिए जरूरी है।

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