शादी नहीं, बच्चे नहीं… ‘डॉल पेरेंटिंग’ का बढ़ता ट्रेंड! आखिर क्यों गुड्डे-गुड़िया पाल रही Gen-Z?

KNEWS DESK: आज की युवा पीढ़ी, खासकर Gen-Z, अपने जीवन के फैसलों को लेकर पहले से काफी अलग सोच रखती है। जहां एक ओर पारंपरिक रूप से शादी और बच्चे जीवन का अहम हिस्सा माने जाते रहे हैं, वहीं अब कई युवा इन जिम्मेदारियों से दूरी बनाते नजर आ रहे हैं। इसी बदलती सोच के बीच एक अनोखा और चौंकाने वाला ट्रेंड तेजी से लोकप्रिय हो रहा है—‘डॉल पेरेंटिंग’। इस ट्रेंड में युवा असली बच्चों की जगह गुड्डे-गुड़िया को पाल रहे हैं और उन्हें अपने बच्चे की तरह प्यार और देखभाल दे रहे हैं।

इस ट्रेंड को ‘दर्द रहित पेरेंटिंग’ भी कहा जा रहा है, क्योंकि इसमें जिम्मेदारी का अहसास तो होता है, लेकिन असली बच्चे की परवरिश जैसा मानसिक, शारीरिक और आर्थिक दबाव नहीं होता। सोशल मीडिया पर ऐसे हजारों वीडियो वायरल हो रहे हैं, जिनमें लोग अपने इन ‘डॉल बेबी’ के साथ बिल्कुल वैसे ही व्यवहार करते हैं जैसे असली बच्चे के साथ किया जाता है। कोई उनका जन्मदिन मनाता है, कोई उन्हें दूध पिलाता है, तो कोई उनके कपड़े बदलता और उन्हें सुलाता नजर आता है।

गुड्डे-गुड़िया साधारण खिलौने नहीं,

हैरानी की बात यह है कि ये गुड्डे-गुड़िया साधारण खिलौने नहीं होते, बल्कि बेहद रियलिस्टिक यानी असली बच्चों जैसे दिखने वाले होते हैं। इनकी कीमत भी हजारों से लेकर लाखों रुपये तक हो सकती है। कई लोग इन पर उतना ही खर्च करते हैं जितना एक असली बच्चे की देखभाल में किया जाता है। इस ट्रेंड के पीछे की सबसे बड़ी वजह है—बढ़ती जिम्मेदारियों का डर, करियर पर फोकस, आर्थिक दबाव और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को प्राथमिकता देना।

विशेषज्ञों का मानना,

विशेषज्ञों का मानना है कि यह ट्रेंड समाज में बदलती मानसिकता और जीवनशैली को दर्शाता है। आज की युवा पीढ़ी अपने तरीके से ‘पेरेंटिंग’ का अनुभव लेना चाहती है, लेकिन बिना किसी स्थायी जिम्मेदारी के। हालांकि, कुछ लोग इसे अजीब और असामान्य मानते हैं, तो कुछ इसे एक व्यक्तिगत पसंद और मानसिक संतुलन का तरीका भी मान रहे हैं। कुल मिलाकर, ‘डॉल पेरेंटिंग’ सिर्फ एक ट्रेंड नहीं, बल्कि बदलते समय और सोच की झलक है, जहां लोग अपनी सुविधा और पसंद के अनुसार जीवन जीने के नए तरीके तलाश रहे हैं।

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