तमिलनाडु के पेरम्बूर गांव में पिछले करीब 100 साल से दिवाली पर पटाखे नहीं जलाए जाते। ग्रामीण 150 साल पुराने बरगद के पेड़ पर रहने वाले सैकड़ों चमगादड़ों को पटाखों के शोर और धुएं से बचाने के लिए यह परंपरा निभा रहे हैं।
Knews Desk- देशभर में दिवाली के मौके पर लोग आतिशबाजी करते हैं, लेकिन तमिलनाडु के मयिलादुथुरई जिले का पेरम्बूर गांव इससे अलग है। यहां ग्रामीण पिछले एक सदी से दिवाली पर पटाखों से दूरी बनाए हुए हैं। इस बार भी गांव में पटाखे नहीं जलाए जाएंगे। इसके बजाय लोग दीये जलाकर और मंदिर में पूजा करके दिवाली मनाएंगे।
गांव में ‘वव्व्वाल थोप्पू’ यानी चमगादड़ों का बाग मौजूद है। यहां करीब 150 साल पुराने बरगद के पेड़ पर सैकड़ों ‘इंडियन फ्लाइंग फॉक्स’ यानी बड़े फलभक्षी चमगादड़ रहते हैं। ग्रामीणों का मानना है कि पटाखों का तेज शोर और धुआं इन बेजुबान जीवों के लिए नुकसानदायक हो सकता है। इसलिए पीढ़ियों से गांव के लोगों ने दिवाली पर आतिशबाजी न करने का फैसला कायम रखा है।
पेरम्बूर के ग्रामीणों का यह प्रयास सिर्फ एक परंपरा नहीं, बल्कि वन्यजीवों के प्रति संवेदनशीलता की मिसाल भी है। ग्रामीण अपनी खुशी के लिए चमगादड़ों के आशियाने को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहते। तमिलनाडु के कझुपेरुम्पक्कम और किट्टमपालयम जैसे कुछ अन्य गांवों में भी इसी तरह की संवेदनशीलता देखने को मिलती है।
चमगादड़ पर्यावरण के लिए भी महत्वपूर्ण माने जाते हैं। फल खाने वाले चमगादड़ बीजों को फैलाने और परागण में भूमिका निभाते हैं, जिससे जंगलों और हरियाली के विस्तार में मदद मिलती है। वहीं, पटाखों का तेज शोर और धुआं उनके प्राकृतिक व्यवहार और आराम में बाधा डाल सकता है।
पेरम्बूर के ग्रामीणों ने इसी बात को समझते हुए दिवाली की खुशी मनाने का तरीका अलग रखा है। यहां लोग दीये जलाते हैं, मंदिर में पूजा करते हैं और त्योहार मनाते हैं, लेकिन पटाखों से पूरी तरह दूरी बनाए रखते हैं। करीब 100 साल से चली आ रही यह परंपरा आज भी गांव के लोगों के लिए उतनी ही महत्वपूर्ण है।