Knews Desk रात के अंधेरे में भी सूरज की रोशनी जैसी चमक देखने की कल्पना अब अंतरिक्ष तकनीक के जरिए साकार करने की दिशा में आगे बढ़ रही है। अमेरिका की कैलिफोर्निया स्थित कंपनी रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल अंतरिक्ष में बड़े परावर्तक शीशों से लैस सैटेलाइट भेजने की योजना बना रही है। इन शीशों की मदद से सूरज की रोशनी को धरती के खास इलाकों की ओर मोड़ा जा सकेगा। इस परियोजना के लिए कंपनी ने हैदराबाद स्थित भारतीय अंतरिक्ष स्टार्टअप स्काईरूट एयरोस्पेस के साथ दो सैटेलाइट लॉन्च करने का समझौता किया है।
रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल के मुताबिक, अंतरिक्ष में मौजूद सैटेलाइट सूरज की रोशनी को परावर्तित करके रात के समय धरती के चुनिंदा हिस्सों को रोशन कर सकेंगे। कंपनी की योजना करीब पांच किलोमीटर चौड़े क्षेत्र में रोशनी पहुंचाने की है। जरूरत के अनुसार इसकी चमक को कम या ज्यादा किया जा सकेगा और आवश्यकता समाप्त होने पर रोशनी बंद भी की जा सकेगी। हालांकि, यह तकनीक अभी विकास और परीक्षण के चरण में है।कंपनी ने इस परियोजना के लिए स्काईरूट के विक्रम-1 और नए विक्रम-1U रॉकेट से लॉन्च करने की योजना बनाई है। विक्रम-1U के पहले चरण में अतिरिक्त बूस्टर लगाए जाएंगे, जिससे रॉकेट की क्षमता बढ़ाने में मदद मिलेगी। रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल का कहना है कि स्काईरूट के साथ साझेदारी से उसे सैटेलाइट लॉन्च करने के लिए एक नया विकल्प मिलेगा। कंपनी अमेरिका से भी लॉन्च करने की योजना बना रही है।
स्काईरूट एयरोस्पेस के CEO पवन चंदाना ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर इस साझेदारी को अंतरिक्ष तकनीक के क्षेत्र में नई संभावनाएं पैदा करने वाला कदम बताया। वहीं, रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल के CEO बेन नोवैक ने नए लॉन्च पार्टनर के साथ काम करने को लेकर उत्साह जताया।इस तकनीक के कई संभावित उपयोग बताए जा रहे हैं। कंपनी के अनुसार, रात में रोशनी पहुंचाने से आपदा के दौरान बचाव अभियान चलाने, दूरदराज के औद्योगिक क्षेत्रों में काम करने और सौर ऊर्जा संयंत्रों से अधिक समय तक बिजली उत्पादन में मदद मिल सकती है। इसके अलावा, रक्षा से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण स्थानों और सार्वजनिक आयोजनों के लिए भी इसका इस्तेमाल किया जा सकता है।रिफ्लेक्ट ऑर्बिटल को जुलाई में अमेरिकी फेडरल कम्युनिकेशंस कमीशन (FCC) से एक परीक्षण सैटेलाइट बनाने, लॉन्च करने और संचालित करने की मंजूरी मिलने की जानकारी दी गई थी। हालांकि, इस मंजूरी का मतलब यह नहीं है कि तकनीक का व्यावसायिक इस्तेमाल बड़े स्तर पर शुरू हो गया है।
अंतरिक्ष से सूरज की रोशनी धरती तक पहुंचाने का विचार नया नहीं है। वर्ष 1993 में रूसी वैज्ञानिकों ने ज्नाम्या नाम का एक प्रयोग किया था, जिसमें करीब 65 फुट का परावर्तक शीशा अंतरिक्ष में भेजा गया था। इस प्रयोग में अंतरिक्ष से धरती पर सूर्य की रोशनी पहुंचाई गई थी, लेकिन आर्थिक सीमाओं के कारण इसे आगे नहीं बढ़ाया जा सका।इस परियोजना को लेकर पर्यावरण संगठनों और खगोलविदों ने चिंता जताई है। उनका मानना है कि रात में अतिरिक्त रोशनी से वन्यजीवों की प्राकृतिक दिनचर्या प्रभावित हो सकती है, इंसानों की नींद पर असर पड़ सकता है और खगोलीय अध्ययन में बाधा आ सकती है। कंपनी का कहना है कि योजना को बड़े स्तर पर लागू करने से पहले वैज्ञानिकों, स्थानीय लोगों और नियामक संस्थाओं के साथ मिलकर काम किया जाएगा। फिलहाल, यह देखना बाकी है कि अंतरिक्ष से रात में रोशनी पहुंचाने की यह तकनीक व्यावहारिक रूप से कितनी सफल होती है।