नए जिलों की आस, चुनावों के पास !

उत्तराखंड डेस्क रिपोर्ट, उत्तराखंड में वर्तमान समय चुनावी वर्ष चल रहा है, क्योंकि कुछ ही महीनों बाद 2027 में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। चुनाव की आहट के बीच अब सत्ता पक्ष के मंत्री और विधायक भी खुलकर अपनी मांगों को सामने रख रहे हैं, जिसमें सबसे अहम नए जिलों के गठन की मांग है जिसने फिर एक बार जोर पकड़ लिया है। प्रदेश के अलग अलग क्षेत्रों में लंबे समय से नए जिले बनाने की मांग उठती रही है। आपको बता दें कि 15 अगस्त 2011 में तत्कालीन मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल निशंक ने पहली बार चार नए जिलों रानीखेत, डीडीहाट, कोटद्वार और यमुनोत्री बनाने की आधिकारिक घोषणा की थी। इसके लिए शासनादेश भी जारी हुआ, लेकिन आगे की प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी। उसके बाद कांग्रेस सरकार में विजय बहुगुणा के कार्यकाल में राजस्व परिषद के अध्यक्ष की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय कमेटी बनाई गई, जिसने प्रारंभिक रिपोर्ट दी लेकिन मामला ठंडे बस्ते में चला गया। फिर सितंबर 2022 में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने नए जिलों के पुनर्गठन को लेकर जनता और जनप्रतिनिधियों से राय मशविरा की बात कही जिससे मुद्दा फिर गरमाया, लेकिन कोई ठोस निर्णय नहीं निकल पाया। वही अब विधानसभा अध्यक्ष और कोटद्वार विधायक ऋतु खंडूरी भूषण ने मुख्यमंत्री से मिलकर कोटद्वार को जिला बनाने की मांग दोहराई है। साथ ही सेवानिवृत्त अधिकारियों के संगठन ने सात नए जिलों – कुमाऊं में काशीपुर, खटीमा, डीडीहाट, रानीखेत और गढ़वाल में रुड़की, गैरसैंण, गंगोत्री की मांग उठाई है। फिलहाल राज्य में 13 जिले हैं। समर्थकों का तर्क है कि नए जिले बनने से दूरस्थ क्षेत्रों में प्रशासनिक पहुंच बेहतर होगी। वहीं कांग्रेस ने इसे चुनावी स्टंट बताया है, जिसके बाद आपसी सियासी बयानबाजी तेज हो गई है।

2027 चुनाव नजदीक आते ही उत्तराखंड में नए जिलों का मुद्दा फिर सुर्खियों में है। इस बार खुद सत्ता पक्ष के विधायकों ने नए जिलों की मांग को हवा देने का काम किया है। राज्य में 13 जिले हैं, लेकिन प्रशासनिक दूरी बड़ी समस्या है। इसी वजह से 2011 में तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक ने कोटद्वार, यमुनोत्री, रानीखेत और डीडीहाट को जिला बनाने की घोषणा की थी। आदेश जारी हुआ, पर धरातल पर कुछ नहीं उतरा। बाद में कांग्रेस सरकार ने राजस्व परिषद के अध्यक्ष की अध्यक्षता में कमेटी बनाई, प्रारंभिक रिपोर्ट आई लेकिन फैसला टल गया। सितंबर 2022 में सीएम धामी ने कहा था कि जनता और जनप्रतिनिधियों से चर्चा के बाद नए जिलों पर निर्णय होगा, लेकिन कुछ हासिल न हो पाया। अब कोटद्वार विधायक ऋतु खंडूरी ने सीएम से मिलकर फिर मांग उठाई है। हालांकि इस विषय को लेकर अलग अलग तर्क दिये जा रहे है। लेकिन कांग्रेस ने इसे केवल चुनावी स्टंट करार दिया हैं। कांग्रेस का आरोप है कि पूरे कार्यकाल इस विषय पर सरकार ने कोई चर्चा नहीं की और अब चुनावों को नजदीक देख यह मामला पुनः सुर्खियों में लाने की कोशिश की जा रही हैं।

 कुल मिलाकर, उत्तराखंड में नए जिलों की मांग केवल प्रशासनिक सुविधा का मुद्दा नहीं रही, बल्कि यह 2027 विधानसभा चुनाव से पहले बड़ा सियासी मुद्दा बनता जा रहा है। एक तरफ सत्ता पक्ष के विधायक इसे जनता की सुविधा और विकास से जोड़कर देख रहे हैं, तो दूसरी तरफ विपक्ष इसे चुनावी साल में जनता को लुभाने वाला स्टंट बता रहा है।  ऐसे में सवाल यह है कि क्या इस बार सरकार 2011 से लटकी घोषणा को धरातल पर उतार पाएगी, या फिर यह मांग भी कमेटी और आश्वासनों में उलझकर रह जाएगी। पहाड़ की भौगोलिक चुनौतियों को देखते हुए नए जिलों की जरूरत तो है, लेकिन सरकार इसके लिए स्पष्ट रोडमैप और राजनीतिक इच्छाशक्ति कब दिखाती है, यह देखना अहम होगा। फिलहाल कोटद्वार से लेकर रानीखेत और डीडीहाट तक लोगों की उम्मीदें फिर जग गई हैं, और चुनाव नजदीक आते ही इस मुद्दे पर सियासी पारा और चढ़ने की पूरी संभावना है जो थमता नज़र नही आ रहा है।

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