Pitru Paksha 2026: आज है द्वादशी श्राद्ध, जानें संन्यासी श्राद्ध का महत्व और नियम

KNEWS DESK- पितृपक्ष में आज द्वादशी श्राद्ध किया जा रहा है। इसे बारस श्राद्ध और संन्यासी श्राद्ध के नाम से भी जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन पितरों के निमित्त तर्पण, श्राद्ध, ब्राह्मण भोज और दान-पुण्य करने का विशेष महत्व माना जाता है।

पितृपक्ष में हर तिथि को पितरों की पूजा और उनके निमित्त किए जाने वाले श्राद्ध कर्म के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। मान्यता है कि व्यक्ति की मृत्यु जिस तिथि को हुई हो, उसी तिथि पर श्राद्ध करने से पितरों को संतुष्टि और शांति प्राप्त होती है। इसी क्रम में द्वादशी तिथि पर किया जाने वाला श्राद्ध द्वादशी श्राद्ध या बारस श्राद्ध कहलाता है।

द्वादशी श्राद्ध केवल उन परिजनों के लिए ही महत्वपूर्ण नहीं माना जाता जिनका निधन द्वादशी तिथि को हुआ हो, बल्कि इसका विशेष संबंध उन लोगों से भी माना जाता है जिन्होंने सांसारिक जीवन का त्याग कर संन्यास ग्रहण किया था। इसी कारण कई धार्मिक परंपराओं में इसे संन्यासी श्राद्ध भी कहा जाता है। साल 2026 में द्वादशी श्राद्ध बुधवार, 7 अक्टूबर को किया जा रहा है।

द्वादशी श्राद्ध को क्यों कहा जाता है संन्यासी श्राद्ध?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जिन लोगों ने सांसारिक मोह-माया का त्याग करके संन्यास ग्रहण किया था, उनके लिए द्वादशी तिथि पर श्राद्ध करने का विशेष महत्व माना गया है। संन्यास लेने वाले लोग अपना जीवन धर्म, भक्ति और साधना को समर्पित करते हैं। इसी वजह से द्वादशी श्राद्ध को संन्यासी श्राद्ध भी कहा जाता है। विशेष रूप से वैष्णव परंपरा से जुड़े संन्यासियों और पितरों के लिए इस तिथि पर श्राद्ध कर्म करने की मान्यता है। माना जाता है कि श्रद्धा के साथ इस दिन किए गए तर्पण, श्राद्ध और दान-पुण्य से पितरों को शांति मिलती है।

किन पितरों के लिए किया जाता है द्वादशी श्राद्ध?

द्वादशी श्राद्ध मुख्य रूप से उन मृतक परिजनों के लिए किया जाता है जिनकी मृत्यु द्वादशी तिथि को हुई हो। पंचांग में शुक्ल और कृष्ण दोनों पक्षों में द्वादशी तिथि आती है, इसलिए मृत्यु की तिथि के अनुसार श्राद्ध का दिन निर्धारित किया जाता है। पितृपक्ष में आने वाली द्वादशी तिथि पर पितरों का विधिपूर्वक श्राद्ध और तर्पण किया जाता है। इस अवसर पर पितरों का स्मरण करके उनके नाम से भोजन, दान और अन्य धार्मिक कार्य करने की परंपरा है।

द्वादशी श्राद्ध में भगवान विष्णु का महत्व

द्वादशी तिथि को भगवान विष्णु की उपासना से भी जोड़कर देखा जाता है। इसलिए इस दिन श्राद्ध कर्म के साथ भगवान विष्णु का स्मरण करने की परंपरा बताई गई है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, द्वादशी श्राद्ध के दिन भगवान विष्णु के नाम का जाप, विष्णुसहस्रनाम का पाठ और यथाशक्ति दान-पुण्य करना शुभ माना जाता है।

द्वादशी श्राद्ध के दिन क्या करें?

द्वादशी श्राद्ध के दिन सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करने के बाद पितरों का स्मरण किया जाता है और श्राद्ध का संकल्प लिया जाता है। इसके बाद विधि के अनुसार तर्पण और पिंडदान किया जाता है। इस दिन ब्राह्मण भोज कराने और जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन या उपयोगी वस्तुओं का दान करने की भी परंपरा है। अपनी सामर्थ्य के अनुसार वस्त्र, पात्र, अन्न आदि का दान किया जा सकता है।

द्वादशी श्राद्ध 2026 का शुभ मुहूर्त

कुतुप मुहूर्त सुबह 11:45 बजे से दोपहर 12:32 बजे तक रहेगा। इसकी अवधि 47 मिनट है।

रौहिण मुहूर्त दोपहर 12:32 बजे से 1:19 बजे तक रहेगा। इसकी अवधि भी 47 मिनट है।

अपराह्न काल दोपहर 1:19 बजे से 3:40 बजे तक रहेगा। इसकी कुल अवधि 2 घंटे 21 मिनट है।

मघा नक्षत्र में द्वादशी श्राद्ध का महत्व

इस बार द्वादशी श्राद्ध के दिन मघा नक्षत्र का संयोग भी बन रहा है। ज्योतिष और धार्मिक मान्यताओं में मघा नक्षत्र को पितरों और पूर्वजों से संबंधित माना जाता है। इसका संबंध पूर्वजों की परंपरा और पितृ सम्मान से जोड़ा जाता है।

ऐसे में मघा नक्षत्र के दौरान पितरों का स्मरण, तर्पण और श्राद्ध कर्म करना विशेष धार्मिक महत्व वाला माना जाता है। मान्यता है कि मघा नक्षत्र अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और उनके आशीर्वाद को याद करने का अवसर देता है। यही वजह है कि द्वादशी श्राद्ध और मघा नक्षत्र का संयोग पितरों के निमित्त किए जाने वाले कर्मों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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