Pitru Paksha 2026: आज दशमी श्राद्ध, जानें तर्पण और श्राद्ध की सही विधि

KNEWS DESK- पितृपक्ष के दौरान हर तिथि का अपना धार्मिक महत्व माना जाता है। इसी परंपरा के अनुसार, जिन पूर्वजों का निधन दशमी तिथि को हुआ था, उनके लिए दशमी श्राद्ध किया जाता है। इसे कई स्थानों पर दसमी श्राद्ध के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन परिवार के लोग अपने पूर्वजों का स्मरण करते हुए श्रद्धा के साथ तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध कर्म करते हैं।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, श्राद्ध कर्म पितरों के प्रति सम्मान और श्रद्धा व्यक्त करने का माध्यम है। इसलिए इस दिन किए जाने वाले कर्मकांड में श्रद्धा और भाव को सबसे महत्वपूर्ण माना गया है। शास्त्रीय मान्यता के अनुसार, मृत्यु शुक्ल पक्ष की दशमी को हुई हो या कृष्ण पक्ष की दशमी को, वार्षिक पार्वण श्राद्ध दशमी तिथि पर किया जाता है।

दशमी श्राद्ध का शुभ समय

दशमी श्राद्ध के लिए दिन के विशेष मुहूर्त और अपराह्न काल को महत्वपूर्ण माना जाता है।

कुतुप मुहूर्त: सुबह 11:46 बजे से दोपहर 12:33 बजे तक। इसकी अवधि 47 मिनट है।

रौहिण मुहूर्त: दोपहर 12:33 बजे से 1:20 बजे तक। इसकी अवधि 47 मिनट है।

अपराह्न काल: दोपहर 1:20 बजे से 3:41 बजे तक। इसकी अवधि 2 घंटे 21 मिनट है।

दशमी श्राद्ध की विधि क्या है?

दशमी श्राद्ध के दिन सुबह स्नान करके साफ कपड़े पहनने और पूजा स्थल को स्वच्छ करने की परंपरा है। इसके बाद पूर्वजों का स्मरण करते हुए श्राद्ध कर्म का संकल्प लिया जाता है।

श्राद्ध कर्म में सबसे पहले पितरों का तर्पण किया जाता है। इसके लिए जल में काले तिल मिलाकर श्रद्धा के साथ पितरों को जल अर्पित किया जाता है। तर्पण के दौरान पूर्वजों के नाम और गोत्र का स्मरण किया जाता है।

इसके बाद परंपरा के अनुसार पिंडदान किया जाता है। पिंड बनाने के लिए चावल, तिल और अन्य सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है। परिवार अपनी धार्मिक परंपरा के अनुसार आगे के श्राद्ध कर्म पूरे करता है।

श्राद्ध के बाद भोजन और दान का महत्व

श्राद्ध कर्म के बाद भोजन कराने और दान करने की भी परंपरा है। कई परिवार अपनी मान्यताओं और परंपराओं के अनुसार ब्राह्मणों को भोजन कराते हैं। इसके अलावा जरूरतमंद लोगों को भोजन, कपड़े या अपनी सामर्थ्य के अनुसार उपयोगी वस्तुओं का दान किया जा सकता है। धार्मिक मान्यता है कि पितरों के नाम पर श्रद्धा से किया गया दान पुण्यदायी होता है। इसलिए श्राद्ध के दौरान अपनी क्षमता के अनुसार दान करने की परंपरा निभाई जाती है।

क्या दशमी तिथि पर केवल दशमी को दिवंगत हुए पूर्वजों का श्राद्ध होता है?

दशमी श्राद्ध मुख्य रूप से उन पूर्वजों के लिए किया जाता है, जिनका निधन दशमी तिथि को हुआ था। यह दशमी शुक्ल पक्ष या कृष्ण पक्ष की हो सकती है। वहीं, अगर किसी व्यक्ति को अपने पूर्वज की मृत्यु तिथि की जानकारी नहीं है, तो पितृपक्ष की सर्वपितृ अमावस्या पर श्राद्ध करने की परंपरा भी बताई जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पितरों का स्मरण और श्राद्ध कर्म श्रद्धा और विधि-विधान के साथ करना महत्वपूर्ण माना जाता है।

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