KNEWS DESK- पितृपक्ष में पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान किया जाता है। हिंदू धर्म में पितृपक्ष की प्रत्येक तिथि का अपना अलग महत्व माना गया है। इसी क्रम में आज 1 अक्टूबर 2026 को षष्ठी श्राद्ध किया जा रहा है। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान और श्रद्धा के साथ पितरों का स्मरण करने से उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है। साथ ही दान-पुण्य और तर्पण को भी इस दिन विशेष महत्व दिया जाता है।
पंचांग के अनुसार, वर्ष 2026 में पितृपक्ष की शुरुआत 26 सितंबर को पूर्णिमा श्राद्ध के साथ हुई थी। वहीं इसका समापन 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के दिन होगा। पितृपक्ष की षष्ठी तिथि 1 अक्टूबर को दोपहर 12:35 बजे शुरू होगी और 2 अक्टूबर को सुबह 10:15 बजे समाप्त होगी। ऐसे में षष्ठी श्राद्ध 1 अक्टूबर को ही किया जाएगा।
षष्ठी श्राद्ध पर कब करें तर्पण और पिंडदान?
श्राद्ध कर्म में तिथि के साथ उचित समय का भी विशेष महत्व माना जाता है। 1 अक्टूबर को कुतुप मुहूर्त सुबह 11:47 बजे से दोपहर 12:34 बजे तक रहेगा। इसकी अवधि 48 मिनट है। इसके बाद रौहिण मुहूर्त दोपहर 12:34 बजे से 1:22 बजे तक रहेगा। इसकी अवधि भी 48 मिनट है। वहीं अपराह्न काल दोपहर 1:22 बजे से शाम 3:45 बजे तक रहेगा। इसकी अवधि 2 घंटे 23 मिनट है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कुतुप मुहूर्त और अपराह्न काल में पितरों के निमित्त श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करना शुभ माना जाता है।
षष्ठी श्राद्ध पर क्या करें?
षष्ठी श्राद्ध के दिन पितरों का स्मरण करते हुए श्रद्धा के साथ तर्पण करने की परंपरा है। तर्पण के लिए जल में काला तिल मिलाकर पितरों को अर्पित किया जाता है। इसके बाद अपनी सामर्थ्य के अनुसार भोजन, वस्त्र या जरूरत की अन्य वस्तुओं का दान किया जा सकता है। जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन कराना भी पितृपक्ष में पुण्यदायी माना जाता है। श्राद्ध कर्म का उद्देश्य केवल धार्मिक विधि को पूरा करना नहीं, बल्कि पूर्वजों को श्रद्धापूर्वक याद करना और उनके प्रति सम्मान प्रकट करना भी माना जाता है। इसलिए इस दौरान मन को शांत रखकर धार्मिक कार्य करने की परंपरा है।
इन 3 गलतियों से बचें
पितृपक्ष के दौरान कुछ बातों का विशेष ध्यान रखने की सलाह दी जाती है। पहली गलती है श्राद्ध कर्म को जल्दबाजी में करना। मान्यता के अनुसार, श्राद्ध श्रद्धा से किया जाने वाला कर्म है, इसलिए इसे शांत मन से करना चाहिए।
दूसरी गलती के तौर पर श्राद्ध के समय घर में विवाद, क्रोध या किसी का अपमान करने से बचना चाहिए। पितृपक्ष को पूर्वजों के स्मरण और सेवा से जोड़कर देखा जाता है, इसलिए इस दौरान वातावरण को शांत और श्रद्धापूर्ण रखना बेहतर माना जाता है।
तीसरी गलती दिखावे के लिए अपनी क्षमता से अधिक खर्च करना है। श्राद्ध में दान और भोजन कराने की परंपरा जरूर है, लेकिन इसके लिए आर्थिक क्षमता से अधिक खर्च करना आवश्यक नहीं माना जाता। अपनी सामर्थ्य के अनुसार जरूरतमंदों को भोजन, वस्त्र या उपयोगी सामान का दान किया जा सकता है।
षष्ठी श्राद्ध का क्या है महत्व?
पितृपक्ष में जिस तिथि को किसी पूर्वज का निधन हुआ हो, सामान्य तौर पर उसी तिथि पर उनका श्राद्ध करने की परंपरा है। इसी क्रम में षष्ठी तिथि को उन पूर्वजों के निमित्त श्राद्ध किया जाता है, जिनका निधन षष्ठी तिथि को हुआ था। इस दिन तर्पण और अन्य श्राद्ध कर्म के जरिए पूर्वजों का स्मरण किया जाता है। पितृपक्ष की परंपरा में श्रद्धा, स्मरण और दान को महत्वपूर्ण माना गया है। इसलिए षष्ठी श्राद्ध के दिन भी अपनी पारिवारिक परंपरा और सामर्थ्य के अनुसार पितरों का तर्पण, दान और श्राद्ध कर्म करना महत्वपूर्ण माना जाता है।