KNEWS DESK- पितृपक्ष हिंदू धर्म में पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और सम्मान प्रकट करने का विशेष समय माना जाता है. इस दौरान लोग अपने दिवंगत परिजनों को याद करते हैं और उनकी तिथि के अनुसार श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान जैसे कर्म करते हैं. तर्पण में जल अर्पित करने की विधि भी विशेष मानी जाती है.
आम पूजा में देवताओं को जल चढ़ाने के लिए हथेली के अलग-अलग हिस्सों का इस्तेमाल किया जाता है. वहीं पितरों के लिए तर्पण करते समय अंगूठे के पास के हिस्से से जल छोड़ने की परंपरा है. धार्मिक मान्यताओं में इसे पितृ तीर्थ कहा गया है. आइए जानते हैं इस परंपरा से जुड़ी मान्यताएं.
कब से शुरू होगा पितृपक्ष?
पंचांग के अनुसार, साल 2026 में पितृपक्ष की शुरुआत 26 सितंबर को पूर्णिमा श्राद्ध से होगी. इसका समापन 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ होगा. इस दौरान लोग अपने पूर्वजों की मृत्यु तिथि के अनुसार श्राद्ध कर्म करते हैं. पितृपक्ष में तर्पण, पिंडदान और दान जैसे धार्मिक कार्य किए जाते हैं. अलग-अलग परंपराओं और पंचांगों में तिथियों के संबंध में अंतर हो सकता है, इसलिए श्राद्ध की तिथि और समय के लिए स्थानीय पंचांग का ध्यान रखना उचित माना जाता है.
श्राद्ध में अंगूठे के पास से ही क्यों दिया जाता है जल?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पितरों को तर्पण करते समय जल अंगूठे और तर्जनी के बीच के हिस्से से अर्पित किया जाता है. हथेली के इस भाग को पितृ तीर्थ कहा जाता है. हिंदू धार्मिक परंपराओं में हथेली के अलग-अलग हिस्सों को अलग-अलग देवताओं और कर्मों से जोड़ा गया है. देवताओं को अर्घ्य देने और पितरों को तर्पण करने की विधि में इसी वजह से अंतर बताया जाता है. पितृ तर्पण में अंगूठे और तर्जनी के बीच से जल छोड़ना पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और सम्मान व्यक्त करने का एक पारंपरिक तरीका माना जाता है. यह धार्मिक मान्यता है, जिसका पालन अलग-अलग परिवारों और क्षेत्रों में अपनी परंपरा के अनुसार किया जाता है.
हथेली के चार तीर्थों का क्या महत्व है?
धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं में हथेली के कुछ हिस्सों को तीर्थ के रूप में बताया गया है. इनके माध्यम से देवताओं, ऋषियों, ब्रह्म और पितरों से जुड़े कर्मों की पहचान की जाती है.
देव तीर्थ: हथेली की उंगलियों के अग्रभाग को देव तीर्थ कहा जाता है. धार्मिक परंपराओं में देवताओं को अर्घ्य या जल अर्पित करने के लिए इस हिस्से का इस्तेमाल किया जाता है.
ऋषि तीर्थ: कनिष्ठिका यानी सबसे छोटी उंगली के मूल भाग को ऋषि या प्रजापति तीर्थ कहा जाता है. कुछ परंपराओं में ऋषियों के तर्पण के लिए इस भाग का उल्लेख मिलता है.
ब्रह्म तीर्थ: हथेली के मूल भाग यानी कलाई के पास के हिस्से को ब्रह्म तीर्थ कहा जाता है. धार्मिक मान्यताओं में इसे ब्रह्म से जुड़े कर्मों के लिए महत्वपूर्ण माना गया है.
पितृ तीर्थ: अंगूठे और तर्जनी के बीच के हिस्से को पितृ तीर्थ कहा जाता है. पितरों को तर्पण करते समय इसी स्थान से जल अर्पित करने की परंपरा है.
पितृपक्ष में तर्पण का क्या महत्व है?
पितृपक्ष में तर्पण पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का एक महत्वपूर्ण धार्मिक कर्म माना जाता है. इसमें जल अर्पित कर दिवंगत परिजनों का स्मरण किया जाता है. कई परंपराओं में तर्पण के जल में काले तिल मिलाने की भी विधि बताई गई है. काले तिल को पितृ कर्मों से जुड़ा माना जाता है. हालांकि, तर्पण की विधि, सामग्री और नियम अलग-अलग परिवारों और क्षेत्रों में भिन्न हो सकते हैं. धार्मिक मान्यता के अनुसार, पितृपक्ष में श्रद्धापूर्वक किए गए श्राद्ध और तर्पण से पूर्वजों का आशीर्वाद प्राप्त होता है. इस दौरान दान, सेवा और जरूरतमंदों की सहायता को भी महत्व दिया जाता है.
सर्वपितृ अमावस्या पर क्या होता है?
पितृपक्ष के अंतिम दिन सर्वपितृ अमावस्या मनाई जाती है. साल 2026 में यह 10 अक्टूबर को होगी. इसे उन पूर्वजों के लिए विशेष माना जाता है जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं होती या जिनका श्राद्ध निर्धारित तिथि पर नहीं हो पाया हो. इस दिन लोग अपने पूर्वजों के लिए तर्पण, श्राद्ध और दान करते हैं. कई परिवारों में इस अवसर पर विशेष भोजन तैयार कर ब्राह्मणों या जरूरतमंदों को भोजन कराने की परंपरा भी है. सर्वपितृ अमावस्या पितृपक्ष के समापन का दिन होती है. इस दिन पूर्वजों को श्रद्धापूर्वक याद कर परिवार की सुख-शांति और समृद्धि के लिए प्रार्थना की जाती है.