आंख के नीचे चोट का निशान दिखाते हुए टीएमसी नेता ने सोशल मीडिया पर लिखा भावुक संदेश, बोले- मेरी आंखें बताती हैं कि अभी बहुत कुछ करना बाकी है
Knews Desk- तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी इन दिनों अमेरिका में आंखों का इलाज करा रहे हैं। इसी बीच उन्होंने बुधवार को इंस्टाग्राम पर अपनी एक क्लोज-अप तस्वीर साझा की, जिसमें उनकी आंख के नीचे चोट का गहरा निशान नजर आ रहा है। तस्वीर के साथ लिखे संदेश को राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय माना जा रहा है।
अभिषेक बनर्जी ने अपनी पोस्ट में लिखा, “यह निशान बताता है कि मैंने बहुत कुछ झेला है. लेकिन मेरी आंखें बताती हैं कि मेरा काम अभी खत्म नहीं हुआ है.”
अभिषेक बनर्जी आंखों की जरूरी जांच और इलाज के लिए अमेरिका गए हैं। उन्होंने जॉन्स हॉपकिन्स में जांच कराने के बाद यह तस्वीर पोस्ट की। बताया गया है कि उन्हें हर साल आंखों की जांच करानी होती है।
चोट के निशान के साथ दिया राजनीतिक संदेश
तस्वीर में आंख के नीचे दिखाई दे रहा निशान एक पुराने सड़क हादसे में लगी चोट से जुड़ा बताया गया है। पोस्ट में अभिषेक ने अपने संघर्षों का जिक्र करते हुए यह संकेत दिया कि मुश्किलों के बावजूद वह अपने राजनीतिक काम से पीछे हटने वाले नहीं हैं।

तृणमूल कांग्रेस इस समय कई राजनीतिक चुनौतियों का सामना कर रही है। चुनाव में पार्टी के प्रदर्शन के बाद कई सांसदों और विधायकों के पार्टी छोड़ने की खबरें सामने आई हैं। वहीं, अभिषेक बनर्जी को जांच एजेंसियों की कार्रवाई और विभिन्न मामलों में कानूनी चुनौतियों का भी सामना करना पड़ रहा है।
करीबी सहयोगी की गिरफ्तारी से बढ़ी मुश्किलें
पश्चिम बंगाल पुलिस की अपराध अन्वेषण शाखा (CID) ने सरकारी जमीन की कथित अवैध बिक्री के मामले में अभिषेक बनर्जी के करीबी सहयोगी सुमित रॉय को 10 सितंबर को गिरफ्तार किया था। इसके बाद अदालत ने उन्हें आठ दिन की सीआईडी हिरासत में भेज दिया।
तीन एफआईआर में अभिषेक को अंतरिम राहत
इससे पहले कलकत्ता हाईकोर्ट ने 7 सितंबर को अभिषेक बनर्जी के खिलाफ दर्ज तीन एफआईआर से जुड़े मामलों में गिरफ्तारी से अंतरिम सुरक्षा दी थी। इससे पहले भी अदालत उन्हें चार एफआईआर से जुड़े दो मामलों में दंडात्मक कार्रवाई से अंतरिम राहत दे चुकी है।
अभिषेक की नई पोस्ट ऐसे समय आई है, जब टीएमसी नेतृत्व पर राजनीतिक और कानूनी दबाव बना हुआ है। उनके संदेश को पार्टी के समर्थकों और राजनीतिक विश्लेषकों के बीच उनके संघर्ष और आगे की सक्रियता के संकेत के तौर पर देखा जा रहा है।