बिहार के 7 हजार ईंट भट्ठों का बदलेगा तरीका, जिग-जैग तकनीक से कम होगा धुआं और बचेगा ईंधन

बिहार में ईंट भट्ठों से निकलने वाले प्रदूषण को कम करने के लिए जिग-जैग तकनीक को बड़े स्तर पर लागू करने की तैयारी है. इस तकनीक से ईंधन की खपत घटाने के साथ ईंटों की गुणवत्ता बेहतर करने का भी लक्ष्य है.

Knews Desk: बिहार में ईंट भट्ठों से होने वाले वायु प्रदूषण को कम करने के लिए सरकार तकनीक में बदलाव पर जोर दे रही है. राज्य के करीब 7 हजार ईंट भट्ठों को जिग-जैग तकनीक से जोड़ने की योजना पर काम किया जा रहा है. माना जा रहा है कि इस तकनीक के इस्तेमाल से भट्ठों से निकलने वाले धुएं और हानिकारक उत्सर्जन में कमी आएगी. इसका फायदा भट्ठों के आसपास रहने वाले लोगों और वहां काम करने वाले मजदूरों को भी मिल सकता है.

जिग-जैग तकनीक का एक अहम फायदा ईंधन की बचत है. अधिकारियों के अनुसार, पारंपरिक भट्ठों की तुलना में इस तकनीक से कोयला, लकड़ी और दूसरे ईंधन की खपत करीब 40 फीसदी तक कम हो सकती है. यानी कम ईंधन में ज्यादा प्रभावी तरीके से ईंटें पकाई जा सकेंगी. इससे भट्ठा संचालकों की लागत कम करने में भी मदद मिल सकती है.

26 टन से घटकर 16 टन तक हो सकता है कोयला

मौजूदा व्यवस्था में करीब एक लाख ईंटों को पकाने के लिए लगभग 26 टन कोयले की जरूरत बताई जाती है. जिग-जैग तकनीक अपनाने के बाद यही खपत करीब 16 टन तक आने का अनुमान है. इससे ईंधन की बचत के साथ उत्पादन की लागत कम होने की संभावना है.

इस तकनीक का असर ईंटों की गुणवत्ता पर भी पड़ता है. ईंटों को ज्यादा समान तरीके से गर्मी मिलने के कारण उनके बेहतर तरीके से पकने की संभावना रहती है. इससे ईंटों की मजबूती बढ़ती है और उनकी टिकाऊ क्षमता भी बेहतर हो सकती है.

प्रदूषण में 75 फीसदी तक कमी का दावा

परंपरागत ईंट भट्ठों में कोयले और लकड़ी के अलावा कुछ जगहों पर टायर और प्लास्टिक जैसे पदार्थों के इस्तेमाल की शिकायत सामने आती रही है. इनके जलने से कार्बन मोनोऑक्साइड, कार्बन डाइऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और पार्टिकुलेट मैटर जैसे प्रदूषक वातावरण में फैलते हैं.

जिग-जैग तकनीक में धुएं और गर्म हवा को नियंत्रित तरीके से भट्ठे के भीतर घुमाया जाता है. इससे काले धुएं और हानिकारक कार्बन उत्सर्जन में करीब 75 फीसदी तक कमी आने का दावा किया जा रहा है. प्रदूषण घटने से आसपास की हवा के साथ मिट्टी, पानी और फसलों पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव को भी कम करने में मदद मिल सकती है.

ईंट भट्ठों के धुएं से क्यों बढ़ती है परेशानी?

ईंट भट्ठों से निकलने वाले धुएं में मौजूद प्रदूषक आसपास के वातावरण और लोगों के स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकते हैं. लंबे समय तक प्रदूषित हवा में रहने से खांसी, सांस लेने में परेशानी, आंखों में जलन और अस्थमा जैसी समस्याएं हो सकती हैं. लगातार प्रदूषण के संपर्क में रहने से फेफड़ों और हृदय से जुड़ी बीमारियों का खतरा भी बढ़ सकता है.

इसका असर सबसे ज्यादा उन मजदूरों और स्थानीय लोगों पर पड़ सकता है, जो लंबे समय तक भट्ठों के आसपास रहते या काम करते हैं. इसी वजह से सरकार ईंट भट्ठों को ज्यादा पर्यावरण अनुकूल बनाने के लिए तकनीकी बदलाव पर जोर दे रही है.

कैसे काम करती है जिग-जैग तकनीक?

जिग-जैग तकनीक में भट्ठे के अंदर ईंटों की व्यवस्था पारंपरिक तरीके से अलग की जाती है. ईंटों को इस तरह लगाया जाता है कि गर्म हवा और धुआं सीधे ऊपर जाने के बजाय घुमावदार यानी जिग-जैग रास्ते से आगे बढ़े.

धुएं का रास्ता लंबा होने से गर्मी भट्ठे के अंदर ज्यादा प्रभावी तरीके से फैलती है. पंखे की मदद से हवा के प्रवाह को नियंत्रित किया जाता है, जिससे ईंटों को अपेक्षाकृत समान गर्मी मिलती है और ईंधन का बेहतर इस्तेमाल हो पाता है.

पारंपरिक भट्ठों में जहां अक्सर गहरे काले धुएं का गुबार दिखाई देता है, वहीं जिग-जैग तकनीक वाले भट्ठों से अपेक्षाकृत हल्का धुआं निकल सकता है. यही बदलाव प्रदूषण नियंत्रण की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है.

बिहार के कई जिलों में शुरू हुआ इस्तेमाल

राज्य के कई जिलों में ईंट भट्ठों पर जिग-जैग तकनीक का इस्तेमाल शुरू किया जा चुका है. जिन भट्ठों में अभी तक यह व्यवस्था लागू नहीं हुई है, वहां संचालकों को इसे अपनाने के लिए निर्देश दिए जा रहे हैं.

नालंदा, जहानाबाद, बेगूसराय, गोपालगंज और मधेपुरा सहित कई जिलों में भट्ठा मालिकों के साथ बैठकें भी हुई हैं. इन बैठकों में तकनीक को लागू करने, लागत और दूसरी व्यावहारिक दिक्कतों को लेकर चर्चा की गई.

सरकार की योजना सिर्फ प्रदूषण कम करने तक सीमित नहीं है. जिग-जैग तकनीक के जरिए ईंधन की खपत घटाकर भट्ठा संचालकों की लागत कम करने और बेहतर गुणवत्ता वाली ईंट तैयार करने पर भी जोर दिया जा रहा है. बिहार के करीब 7 हजार ईंट भट्ठों में इस तकनीक को लागू करने से प्रदूषण नियंत्रण के साथ ईंट उद्योग में भी बड़ा बदलाव आने की उम्मीद है.

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