Knews Desk: पश्चिम बंगाल में 2026 विधानसभा चुनाव के बाद SIR यानी विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर विवाद और गहराता जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को हुई सुनवाई के दौरान यह सवाल भी उठा कि अगर मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर गलत तरीके से नाम हटाए गए हों और उसका चुनावी नतीजों पर असर पड़ा हो, तो क्या दोबारा चुनाव कराने का आदेश दिया जा सकता है।
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन ने ट्रिब्यूनल के फैसलों से जुड़े आंकड़े कोर्ट के सामने रखे। उनके मुताबिक अब तक SIR से जुड़े करीब 83 हजार मामलों में फैसला आया है। इनमें लगभग 75 हजार मामलों में मतदाताओं के नाम काटे जाने को गलत माना गया। यानी करीब 90 फीसदी मामलों में नाम हटाने का फैसला सही नहीं पाया गया।
बंगाल में SIR से जुड़े कुल मामलों की संख्या करीब 38 लाख बताई जा रही है। इनमें लगभग 31 लाख मामले उन लोगों ने दाखिल किए हैं, जिनके नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं, जबकि करीब 7 लाख मामले ऐसे लोगों से जुड़े हैं, जिन्होंने अपने नाम को सूची में बनाए रखने के लिए अपील की है। फिलहाल कुल मामलों के मुकाबले बहुत कम मामलों में ही फैसला आया है।
31 विधानसभा सीटों पर कितना असर?
SIR विवाद का सबसे बड़ा राजनीतिक असर उन सीटों पर बताया जा रहा है, जहां जीत का अंतर मतदाता सूची से हटाए गए नामों की संख्या से कम है। तृणमूल कांग्रेस के सांसद और वरिष्ठ वकील कल्याण बनर्जी के अनुसार ऐसी 31 विधानसभा सीटें हैं। इनमें बाली, हेमताबाद और सतगछिया जैसी सीटें शामिल हैं।
TMC का दावा है कि SIR के दौरान जिन मतदाताओं के नाम हटाए गए, उनमें बड़ी संख्या उसके समर्थकों की थी। पार्टी का कहना है कि अगर इन मतदाताओं को मतदान का मौका मिलता तो कई सीटों के नतीजे बदल सकते थे।
तृणमूल ने यह भी आंकड़ा सामने रखा है कि विधानसभा चुनाव में बीजेपी को करीब 2 करोड़ 93 लाख वोट मिले, जबकि TMC को लगभग 2 करोड़ 60 लाख वोट हासिल हुए। दोनों दलों के बीच वोटों का अंतर करीब 30 लाख बताया गया है। ऐसे में SIR से जुड़े 38 लाख मामलों का आंकड़ा राजनीतिक तौर पर बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।
सुप्रीम कोर्ट में दोबारा चुनाव पर क्या हुआ?
सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने पूछा कि क्या सुप्रीम कोर्ट नए सिरे से चुनाव कराने का निर्देश दे सकता है। इस पर कोर्ट ने कहा कि इस मुद्दे पर विचार किया जा सकता है और संबंधित पक्ष को पहले आवेदन दाखिल करने को कहा गया।
जस्टिस जॉयमाल बागची ने एक उदाहरण देते हुए कहा कि अगर किसी सीट पर जीत का अंतर 50 वोट है और 100 मतदाताओं के नाम काटे गए हैं, तो ट्रिब्यूनल में इनमें से 70 नामों को गलत तरीके से हटाया गया पाया जाता है, तो चुनावी नतीजे पर इसका सीधा असर पड़ सकता है।
हालांकि, अभी सुप्रीम कोर्ट ने बंगाल में दोबारा चुनाव कराने का कोई आदेश नहीं दिया है। संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव कराने की जिम्मेदारी निर्वाचन आयोग की है। वहीं अनुच्छेद 142 सुप्रीम कोर्ट को पूर्ण न्याय के लिए व्यापक अधिकार देता है। अब देखना होगा कि SIR से जुड़े मामलों में अदालत आगे क्या रुख अपनाती है।
क्या बंगाल में दोबारा चुनाव होंगे?
फिलहाल ऐसा कहना जल्दबाजी होगी। अभी केवल SIR से जुड़े मामलों में आए शुरुआती फैसलों और उनके संभावित चुनावी प्रभाव पर बहस हो रही है। 83 हजार मामलों में 90 फीसदी नामों को गलत तरीके से काटे जाने का दावा निश्चित तौर पर गंभीर है, लेकिन पूरे 38 लाख मामलों का अंतिम नतीजा सामने आने के बाद ही स्थिति स्पष्ट होगी।
यानी फिलहाल बंगाल में दोबारा चुनाव की कोई घोषणा नहीं हुई है, लेकिन अगर बड़ी संख्या में गलत तरीके से नाम हटाए जाने की बात साबित होती है और उसका सीधा असर चुनावी नतीजों पर पड़ता है, तो यह मामला बेहद महत्वपूर्ण हो सकता है।