जब आजादी से पहले पर्दे पर गूंजा देशभक्ति का सुर, 1936 की इस फिल्म ने रचा इतिहास

Knews Desk– भारत आज अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है। आजादी के इस खास मौके पर जब देशभर में देशभक्ति के गीत और फिल्मों की चर्चा हो रही है, तब हिंदी सिनेमा की उस फिल्म को याद करना भी दिलचस्प है, जिसने आजादी से पहले ही पर्दे पर राष्ट्रप्रेम की भावना को आवाज दी थी। साल 1936 में रिलीज हुई फिल्म ‘जन्मभूमि’ को हिंदी सिनेमा की शुरुआती देशभक्ति फिल्मों में महत्वपूर्ण स्थान हासिल है। खास बात यह है कि इस फिल्म का निर्देशन भारतीय फिल्मकार ने नहीं, बल्कि जर्मन मूल के निर्देशक फ्रांज ओस्टेन ने किया था।

‘जन्मभूमि’ ऐसे दौर में रिलीज हुई थी, जब भारत ब्रिटिश शासन के अधीन था और फिल्मों में राष्ट्रवादी विचारों को खुलकर पेश करना आसान नहीं था। इसके बावजूद फिल्म की कहानी और गीतों में देश, समाज और मातृभूमि के प्रति प्रेम की भावना को प्रमुखता दी गई। उस समय सिनेमा सिर्फ मनोरंजन का माध्यम नहीं था, बल्कि सामाजिक और राष्ट्रीय विचारों को लोगों तक पहुंचाने का भी एक प्रभावी जरिया बन रहा था। ‘जन्मभूमि’ ने इसी बदलाव को आगे बढ़ाने का काम किया।फिल्म का निर्देशन फ्रांज ओस्टेन ने किया था। जर्मनी से भारत आए ओस्टेन ने भारतीय सिनेमा के शुरुआती दौर में कई महत्वपूर्ण फिल्मों का निर्देशन किया। उन्होंने हिमांशु राय और देविका रानी से जुड़े बॉम्बे टॉकीज के साथ भी काम किया था। भारतीय संस्कृति और सामाजिक परिवेश को समझने वाले ओस्टेन ने अपने निर्देशन के जरिए भारतीय कहानियों को पर्दे पर उतारने की कोशिश की। ‘जन्मभूमि’ भी इसी दौर की उनकी चर्चित फिल्मों में शामिल थी।

इस फिल्म की सबसे खास बात इसका देशभक्ति गीत था। ‘जय जय जननी जन्मभूमि’ जैसे गीत के जरिए मातृभूमि के प्रति प्रेम और राष्ट्रभावना को आवाज दी गई। इसे हिंदी सिनेमा के शुरुआती क्रांतिकारी देशभक्ति गीतों में गिना जाता है। उस दौर में गीत लोगों तक संदेश पहुंचाने का बेहद प्रभावी माध्यम थे। इसलिए फिल्म के देशभक्ति गीतों ने दर्शकों के बीच राष्ट्रप्रेम और अपनी मातृभूमि के प्रति भावनात्मक जुड़ाव पैदा करने में अहम भूमिका निभाई।1930 के दशक में भारतीय सिनेमा अभी अपने शुरुआती दौर में था। बोलती फिल्मों का दौर शुरू हो चुका था और सिनेमा धीरे-धीरे आम लोगों की जिंदगी का हिस्सा बन रहा था। ऐसे समय में ‘जन्मभूमि’ जैसी फिल्म का आना अपने आप में महत्वपूर्ण था। फिल्म ने मनोरंजन के साथ-साथ देश और समाज से जुड़े विचारों को भी पर्दे पर जगह दी। आजादी से पहले किसी फिल्म में इस तरह राष्ट्रभावना को प्रमुखता देना उस दौर के लिहाज से काफी अहम माना जाता है।

आजादी के बाद हिंदी सिनेमा में देशभक्ति फिल्मों की एक लंबी परंपरा देखने को मिली। ‘शहीद’, ‘हकीकत’, ‘उपकार’, ‘पूरब और पश्चिम’, ‘क्रांति’ और ‘बॉर्डर’ जैसी फिल्मों ने अलग-अलग दौर में देशभक्ति की भावना को पर्दे पर मजबूती से पेश किया। हालांकि, इन फिल्मों से कई दशक पहले ‘जन्मभूमि’ ने उस समय राष्ट्रप्रेम की आवाज बुलंद की थी, जब देश अंग्रेजी हुकूमत के अधीन था।80वें स्वतंत्रता दिवस के मौके पर ‘जन्मभूमि’ को याद करना इसलिए भी खास है, क्योंकि यह फिल्म बताती है कि हिंदी सिनेमा में देशभक्ति का सिलसिला आजादी के बाद शुरू नहीं हुआ था। आजादी से पहले भी फिल्मकारों ने सिनेमा और संगीत के जरिए मातृभूमि, समाज और राष्ट्रप्रेम की भावना को लोगों तक पहुंचाया था। यही वजह है कि 1936 की ‘जन्मभूमि’ भारतीय सिनेमा के इतिहास में देशभक्ति फिल्मों की शुरुआती और यादगार कड़ी के रूप में आज भी चर्चा में रहती है।

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